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हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

हम्मीर रासो (कवि जोधराज - रणथम्भौर हम्मीर देव का शरणागत धर्म एवं शौर्य इतिहास)

Hammir Raso of Jodhraj on Ranthambore Defense

कवि जोधराज द्वारा

DevanagariHindipublished258 पृष्ठ

पृष्ठ 12, कुल 258 में से

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पृष्ठ 12

( २ )
ग्रंथ मिलते हैं। रासो, रास या रासा संस्कृत के 'रासक' शब्द से
बने हैं जिसका अर्थ 'काव्य' होता है। अपभ्रंश में 'रासक' लिखने
की प्रथा बहुत थी। भारतीय विद्याभवन बंबई से अदहमान (अब्दु-
रहमान) का जो 'संदेशरासक' प्रकाशित हुआ है उससे प्रमाणित है
कि देशभाषा अपभ्रंश की प्राचीन परंपरा वैसी ही भेद-भावशून्य थी
जैसी हिंदी की आधुनिक काल के पूर्व तक रही है। अपने को 'मिच्छ'
(म्लेच्छ) देश (वर्तमान सीमाप्रांत) का निवासी बतलाते हुए
कवि ने बड़ी विनय से ग्रंथ का आरंभ किया है।
हिंदी में 'रासो' शब्द चल पड़ा है, पर खड़ी बोली हिंदी के
गद्य में उसका रूप 'रासा' ही होना चाहिए। अभी तक यह शब्द
अनुमित संस्कृत शब्दों के साथ जोड़ा जाता रहा है! आश्चर्य की
बात है कि 'पृथ्वीराजरासा' के हस्तलेखों की पुष्पिकाओं में
प्रयुक्त होने पर भी 'रासक' शब्द की ओर विद्वानों का ध्यान नहीं
गया। प्रस्तुत ग्रंथ का गतानुगतिक नाम 'हम्मीररासो' ही है। मूल
पाठों की एकरूपता के लिये पुराने हस्तलेखों के व्यवहार-बाहुल्य
के आधार पर 'वर्तनी' रखी गई है। पाठ-संपादन में पूर्वोक्त अनु-
लिपि का ही सहारा रहा है। पर अनुलिपिकर्ता ने उतनी सावधानी
से कार्य नहीं किया जितनी ऐसे ग्रंथ के लिये अपेक्षित थी। प्राचीन
हस्तलेखों में 'वर्तनी' अनेक प्रकार की मिलती है। इसके कारण
देशभेद, कालभेद, भाषाभेद आदि हैं। राजपूताने और अवध प्रांत
के हस्तलेखों में, सोलहवीं शताब्दी और अठारहवीं शताब्दी के
हस्तलेखों में तथा बुंदेली और भोजपुरी जनपदों में मिले हस्तलेखों
में 'वर्तनी' का अंतर बहुत है। कवि अपने समय तक विकसित रूपों
के साथ ही काव्य-परंपरा में व्यवहृत रूपों को भी बनाए रहते हैं।
इसलिये जब तक कवि के हाथ को ही लिखा कोई हस्तलेख न मिले
तब तक किसी प्रामाणिक हस्तलेख का ही आधार मानकर 'वर्तनी'
रखी जा सकती है और उस समय के प्रचलन आदि के अनुमान पर
ही पाठों का संपादन किया जा सकता है। प्राचीन हस्तलेखों में 'न'