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सर्वकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

DevanagariHindipublished647 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 647 में से

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पृष्ठ 74

अतः यहाँ 'मनोमय' अवश्य ही परम पूज्य परमेश्वर ही हैं,
जो कि उपासक जीव से सर्वथा भिन्न हैं।
सूत्र ६
स्मृतेश्च ॥ १.२.६ ॥
स्मृतेः — स्मृति-शास्त्र के प्रमाण से; च — भी।
और स्मृति-शास्त्र के वचन से भी (यही सिद्ध होता है)।
श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचित गोविन्द-भाष्य
परमेश्वर जीव से भिन्न हैं, इस सिद्धान्त की पुष्टि
भगवद्गीता (१८.६१) के निम्नलिखित वचन से भी होती है:
ईश्वरः सर्वभूतानां
हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन् सर्वभूतानि
यन्त्रारूढानि मायया ॥
"हे अर्जुन! परमेश्वर समस्त जीवों के हृदय-देश में स्थित हैं और
भौतिक प्रकृति रूपी यन्त्र पर आरूढ़ सभी जीवों को
अपनी माया से परिभ्रमण करा रहे हैं।"
पूर्वपक्ष (शङ्का): छान्दोग्योपनिषद् (३.१४.३) में
मनोमय का वर्णन इन शब्दों में मिलता है: "एष म आत्मान्तर्हृदयेऽणीयान्व्रीहेर्वा यवाद्वा"
(हृदय के भीतर स्थित यह आत्मा धान अथवा जौ के दाने से भी अधिक सूक्ष्म है)। इस श्रुति से स्पष्ट होता है कि
अत्यन्त सूक्ष्म परिमाण होने के कारण मनोमय अवश्य ही 'जीव' होना चाहिए,
परमेश्वर नहीं।
सूत्र ७
अर्भकौकस्त्वात्तद्व्यपदेशाच्च नेति चेन्न निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च ॥ १.२.७ ॥
अर्भक — अल्प/सूक्ष्म; ओकस्त्वात् — स्थान/आश्रय होने से; तत् — उसका; व्यपदेशात् — निर्देश/वर्णन होने से;
च — और; न — नहीं; इति — ऐसा; चेत् — यदि कहें तो; न — ऐसा नहीं है; निचाय्यत्वात् — ध्यान/उपासना के प्रयोजन से;
एवम् — इस प्रकार; व्योमवत् — आकाश के समान; च — भी।