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सर्वकोश
गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)

Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary

श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा

DevanagariHindipublished647 पृष्ठ

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॥ अधिकरणम् २ : वायुलोकाधिकरणम् ॥
अधिकरण २ : वायुलोक
श्रील बलदेव विद्याभूषण द्वारा भूमिका (गोविन्दभाष्यम्) :
अर्चिरादि क्रम में वायुलोक आदि का भी सन्निवेश (समावेश) होना चाहिए—यह प्रतिपादन करने के लिए अब नया विचार प्रारम्भ किया जाता है।
पूर्वोद्धृत कौषीतकि उपनिषद् (१.३) के वचन में कहा गया है:
श्रुति: "स एतं देवयानं पन्थानमापद्याग्निलोकमागच्छति स वायुलोकम्..."
श्रुति का अनुवाद: "वह इस देवयान मार्ग को प्राप्त कर पहले अग्निलोक में जाता है, फिर वह वायुलोक में जाता है।"
संशय: क्या वायुलोक का अर्चि आदि से आरम्भ होने वाले मार्ग में समावेश होना चाहिए, अथवा नहीं?
पूर्वपक्ष: इसका समावेश नहीं होना चाहिए, क्योंकि श्रुति-शास्त्र इन सोपानों का एक विशिष्ट क्रम से वर्णन करता है, और अपनी इच्छानुसार उस क्रम में परिवर्तन नहीं किया जा सकता।
सिद्धान्त: इसके समाधान में सूत्रकार भगवान् बादरायण अपना निर्णय प्रस्तुत करते हैं—
॥ ब्रह्मसूत्रम् ॥
सूत्र २: वायुमब्दादविशेषविशेषाभ्याम् ॥ २ ॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ:
वायुम् — वायुलोक की प्राप्ति (वायु को);
अब्दात् — संवत्सर (वर्ष) के अनन्तर;
अविशेष-विशेषाभ्याम् — अविशेष (सामान्य) तथा विशेष प्रमाणों के आधार पर।
सूत्रार्थ (हिन्दी अनुवाद):
संवत्सर (वर्ष) के पश्चात् वायु की प्राप्ति होती है, क्योंकि यह क्रम अविशेष (सामान्य श्रुति) और विशेष (निर्दिष्ट श्रुति) दोनों प्रकार के वचनों से सिद्ध होता है।
श्रील बलदेव विद्याभूषण कृत भाष्य / तात्पर्य: