गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयथा हि शरीरस्यैकदेशे निहितं चन्दनबिन्दुः समग्रं शरीरं सुखयति,
तथा एकदेशस्थितोऽपि जीवात्मा सर्वं देहं चेतयते इति न कश्चिद् विरोधः।
तथा च ब्रह्माण्डपुराणे पठ्यते—
अणुमात्रोऽप्ययं जीवः स्वदेहं व्याप्य तिष्ठति।
यथा व्याप्य शरीराणि हरिचन्दनविप्रुषः॥
(अर्थात्—यथा चन्दनस्य बिन्दुः स्वस्पर्शसुखेन समग्रं शरीरं व्याप्नोति, तथैवायम् अणुरपि जीवः समग्रं देहं व्याप्य वर्तते।)
॥ ब्रह्मसूत्रम् २.३.२३ ॥
अवस्थितिवैशेष्यादिति चेन्नाभ्युपगमाद्धृदि हि॥ २३ ॥
पदच्छेदः—
अवस्थिति-वैशेष्यात्, इति, चेत्, न, अभ्युपगमात्, हृदि, हि।
पदविभागः तथा शब्दार्थः—
अवस्थिति-वैशेष्यात् = अवस्थानस्य विशेषभावात् (चन्दनस्यैकदेशे प्रत्यक्षमुपलब्धेः);
इति चेत् = यदि एवमुच्येत;
न = तन्न साधु;
अभ्युपगमात् = श्रुतिषु अङ्गीकृतत्वात्;
हृदि = हृदयदेशे;
हि = यतः।
सूत्रार्थः—
यदि कोऽपि ब्रूयात् यच्चन्दनस्य तु शरीरस्य कस्मिंश्चिदेकदेशे प्रत्यक्षं स्थानविशेषोपलब्धिर्भवति,
परं जीवस्य तादृशावस्थानविशेषो नोपलभ्यते, अतः स दृष्टान्तो न युक्तः इति चेत्;
तन्न, यतो हि श्रुतिषु जीवस्य हृदयप्रदेशे अवस्थानमभ्युपगतम्।
॥ श्रीगोविन्दभाष्यम् (श्रील बलदेव विद्याभूषण विरचितम्) ॥
पूर्वपक्षः—
ननु चन्दनबिन्दोः शरीरे कस्मिंश्चिदेकस्मिन् प्रदेशे प्रत्यक्षत एवावस्थितिर्विशेषेणोपलभ्यते,
जीवस्य तु देहे तथा कश्चिदेकदेशीयो विशेषसम्बन्धो नोपलभ्यते।
अतः आकाशवत् सर्वत्रैव देहे तस्य व्यापकत्वं किमिति नाभ्युपेयते?
तस्मात् चन्दनदृष्टान्तोऽत्र विषमोऽसमञ्जसश्चेति।
सिद्धान्तः—
इति चेत्, तन्न; कुतः? अभ्युपगमात्।
यतो हि श्रुतौ जीवस्य हृद्येवावस्थानं प्रतिपादितम्।
तथा च प्रश्नोपनिषदि (३.६) श्रूयते—
"हृदि ह्येष आत्मा" इति।
॥ हिन्दी-अनुवाद एवं व्याख्या ॥
[पूर्वसन्दर्भ:] जिस प्रकार शरीर के किसी एक अंग पर लगाया गया चन्दन का एक बिन्दु (बूँद) समस्त शरीर को आह्लादित कर देता है,
उसी प्रकार एक ही स्थान पर स्थित रहता हुआ भी यह जीवात्मा सम्पूर्ण शरीर का अनुभव कर लेता है; अतः कोई विरोध नहीं है।
ब्रह्माण्डपुराण में भी ऐसा कहा गया है—
"यद्यपि यह जीवात्मा अणुस्वरूप है, तथापि यह सम्पूर्ण देह को व्याप्त करके स्थित रहता है;
ठीक उसी प्रकार जैसे हरिचन्दन की एक नन्हीं बूँद सम्पूर्ण शरीर को अपने प्रभाव से व्याप्त कर लेती है।"
॥ सूत्र २३ की व्याख्या ॥
[आक्षेप:] यदि कोई यह शङ्का करे कि चन्दन के बिन्दु की तो शरीर के किसी एक भाग में प्रत्यक्ष स्थिति देखी जाती है,
किन्तु जीवात्मा का शरीर में ऐसा कोई निश्चित स्थान प्रत्यक्ष ज्ञात नहीं होता,
वह तो आकाश की भाँति सम्पूर्ण देह में ही व्याप्त प्रतीत होता है, अतः चन्दन का दृष्टान्त विषम (अनुपयुक्त) है;
[समाधान:] तो यह शङ्का ठीक नहीं है; क्योंकि श्रुति-शास्त्रों में जीवात्मा की स्थिति विशेष रूप से हृदय में स्वीकार की गई है।
[श्रील बलदेव विद्याभूषण भाष्य-सार:]
श्रुति स्पष्ट रूप से प्रतिपादित करती है कि जीवात्मा का वास्तविक निवास-स्थान भौतिक शरीर का हृदय-कमल ही है।
जैसा कि प्रश्नोपनिषद् (३.६) के प्रमाण से सिद्ध होता है—"यह आत्मा निश्चय ही हृदय में स्थित है।"