गोविन्द भाष्य (श्रील बलदेव विद्याभूषण - अचिन्त्यभेदाभेद वेदान्त ब्रह्मसूत्र भाष्य सटीक)
Govinda Bhashya of Baladeva Vidyabhushana with Commentary
श्रील बलदेव विद्याभूषण (संपादक: कृष्णदास बाबा जी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ श्रीमद्ब्रह्मसूत्रम् - आनुमानिकाधिकरणम् ॥
[विषयः]
पूर्वसूत्रेषु प्रतिपादितं यत् परब्रह्मैव परमप्राप्यं मोक्षप्रदञ्च, यतोऽस्य जगतो जन्म-स्थिति-प्रलयाः सम्भवन्ति।
तच्च परं ब्रह्म जडजीवाभ्यां विलक्षणम्, अचिन्त्य-अनन्त-शक्तिसमन्वितम्, सर्वज्ञम्, निखिल-दोष-रहितम्, समस्त-कल्याण-गुणात्मकं च वर्तते।
साम्प्रतं कपिलतन्त्रोक्तस्य प्रधानस्य (प्रकृतेः) पुंसश्च (जीवस्य) जगत्कारणत्ववादिनां मतं विचार्यते।
तत्र केषाञ्चिच्छाखायां कठोपनिषद्वाक्यमुदाहृत्य साङ्ख्यमतमाशङ्क्यते—
[श्रुति-प्रमाणम् (कठोपनिषद् ३.१०-११)]
इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः ॥
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः ।
पुरुषान्न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥
[श्रुतेः हिन्दी-अनुवादः]
इन्द्रियों की अपेक्षा विषय (अर्थ) पर (सूक्ष्म एवं श्रेष्ठ) हैं; विषयों की अपेक्षा मन पर है;
मन से परे बुद्धि है और बुद्धि से परे महत्तत्त्व (महान् आत्मा) है।
महत्तत्त्व से परे अव्यक्त है तथा अव्यक्त से परे पुरुष (परमात्मा) है।
पुरुष से परे कुछ भी नहीं है; वही चरम सीमा (काष्ठा) है और वही परम गति है।
[संशयः]
अत्र संशयः उत्पद्यते—किमस्मिन् वाक्ये 'अव्यक्त' शब्देन साङ्ख्यस्मृत्युक्तं स्वतन्त्रं प्रधानं गृह्यते, अथवा शरीरं गृह्यते इति?
(हिन्दी: यहाँ यह संशय है कि श्रुति में प्रयुक्त 'अव्यक्त' शब्द से साङ्ख्योक्त प्रधान लिया जाए या शरीर?)
[पूर्वपक्षः]
पूर्वपक्षी मन्यते यत्—श्रुतौ महच्छब्दात् परत्वेनाव्यक्तस्य, अव्यक्ताच्च परत्वेन पुरुषस्य कीर्तनात् साङ्ख्यस्मृतिप्रसिद्धमेव प्रधानमिह अव्यक्तशब्देन ग्राह्यम्।
यतः स्मृतिसिद्धः क्रम एव इहापि प्रत्यभिज्ञायते, तस्मादव्यक्तं प्रधानमेवेति।
(हिन्दी: पूर्वपक्षी का कथन है कि श्रुति और स्मृति दोनों में महत्, अव्यक्त और पुरुष का क्रम समान होने से अव्यक्त शब्द साङ्ख्य के त्रिगुणात्मक प्रधान का ही वाचक है।)
[सिद्धान्तः]
अत्रोच्यते—'अव्यक्त' शब्देन साङ्ख्योक्तं प्रधानं न गृह्यते, किन्तु शरीरमेव गृह्यते।
एतदेव भगवता बादरायणेन अग्रिमे सूत्रे स्पष्टीक्रियते—
[ब्रह्मसूत्रम् १.४.१]
आनुमानिकमप्येकेषामिति चेन्न शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेर्दर्शयति च ॥ १ ॥
[पदच्छेदः एवं शब्दार्थः]
आनुमानिकम् = अनुमानेन कल्पितं साङ्ख्यसिद्धं प्रधानम् (अनुमानसिद्ध प्रधान)
अपि = अपि च (भी)
एकेषाम् = शाखिनां कठशाखाप्रभृतीनाम् (शाखा-विशेष के मत में)
इति चेत् = यदि एवं मन्येत (यदि ऐसा कहें)
न = तन्न साधु (तो ऐसा नहीं है)
शरीररूपकविन्यस्तगृहीतेः = पूर्ववाक्ये रथरूपकेण निक्षिप्तस्य शरीरस्यैवात्र अव्यक्तशब्देन परिग्रहात् (शरीर के रूपक में स्थित होने के कारण उसी का ग्रहण होने से)
दर्शयति = श्रुतिः स्वयमेवैतत् स्पष्टीकरोति (श्रुति स्वयं ऐसा दिखलाती है)
च = तथा (और)
[सूत्रार्थः एवं भाष्य-निष्कर्षः]
यदि कोई कहे कि शाखा-विशेष (कठोपनिषद्) में अनुमानसिद्ध साङ्ख्य का प्रधान ही 'अव्यक्त' शब्द से कहा गया है,
तो यह कथन उचित नहीं है; क्योंकि पूर्वप्रकरण में रथरूपक की योजना करते हुए 'आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु' इत्यादि वाक्यों द्वारा
शरीर को ही रथ के रूप में निरूपित किया गया है।
अतः परिशेषप्रमाण से यहाँ 'अव्यक्त' शब्द का अर्थ साङ्ख्यस्मृत्युक्त अचेतन प्रधान न होकर भौतिक 'शरीर' ही सिद्ध होता है,
और श्रुति आगे के प्रकरण में भी इसी भाव को प्रकट करती है।