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सर्वकोश
गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished600 पृष्ठ

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पृष्ठ 36

( ३० )
कण्डिका विषय पृष्ठ
८—होता यक्षत् होता यक्षत्-इन मन्त्रों के उच्चारण का विषय ... ३७४
६--हिङ्कार [ प्रतिध्वनि ] के उच्चारण की महिमा और प्रमाण ... ३७७
१०--प्रातःसवन, माध्यन्दिन और तृतीय सवन में विशेषता से मन्त्रों
का प्रयोग ... ... ... ३८०
११--छन्दों के साथ प्रणव का सम्बन्ध और व्याख्यान ... ... ३८३
१२--एकाह यज्ञ के प्रातःसवन में प्रजापति मृत्यु को स्तोत्रों द्वारा
भगांता है : ... ... ... ... ३८५
१३--प्रातःसवन में मैत्रावरुण द्वारा मित्र और वरुण की स्तुति .. ३८७
१४-प्रातःसवन में ब्राह्मणाच्छंसी द्वारा इन्द्र और सूर्य की स्तुति ... ३८६
१५--प्रातःसवन में अच्छावाक द्वारा इन्द्र और अग्नि की स्तुति ... ३६२
१६--प्रातःसवन में ( शंसावोम् ) मन्त्र को चार-चार बार बोलें : ३६४
१७ माध्यन्दिन सवन में दक्षिणा दातव्य है ... ... ३६६
१८--दक्षिणापात्र लोगों का क्रम ... ... ... ३६८
१६--दक्षिणा में दातव्य पदार्थ और उनके गुण ... ... ३६६
२०--आख्यायिका के रूप में ऋक् और साम के सम्बन्ध का वर्णन ... ४०१
२१- स्तोत्रिय आदि यज्ञाङ्गों की आत्मा आदि से सामान्यता ... ४०४
२२-स्तोत्र इत्यादि यज्ञाङ्गों की आत्मा आदि से सदृशता का अधिक
विवरण ... ... ... ... ४०५
२३--माध्यन्दिन सवन के देवता इन्द्र की महिमा ... ... ४०८
प्रपाठक ४ ॥
१--एकाह यज्ञ के माध्यन्दिन सवन में मैत्रावरुण के मन्त्र प्रयोग ... ४१२
२-एकाह यज्ञ के माध्यन्दिन सवन में ब्राह्मणाच्छंसी के मन्त्र प्रयोग ... ४१३
३-एकाह यज्ञ के माध्यन्दिन सवन में अच्छावाक के मन्त्र प्रयोग ... ४१६
४-एकाह यज्ञ के माध्यन्दिन सवन में ( शंसावोम् ) मन्त्र को पांच
बार बोलें ... ... ... ... ४१६
५-एकाह यज्ञ के तृतीय सवन में पत्नीवत स्तोत्र को आग्नीध्र का
चुपके चुपके जपने का कारण ... ... ... ४२१
६-तृतीयसवन में शाकला इष्टि ... ... ... ४२२
७-अध्वर्युं और यजमान की शुद्धि और अवभृथ स्नान ... ... ४२४
८-वेदी पर ओषधि स्थापन और सक्तुओं से होम ... ... ४२५
६-एकाष्टका इष्टि और दो अरणियों से अग्नि समारोपण ... ४२७
१०-अग्निष्टोम सूर्य समान है, तीनों सवनों में मन्त्र बोलने का विधान
सूर्य न कभी उदय और न अस्त होता है इसका विचार - ४३०