गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६४ उत्तरकाण्ड
अनुपम है, उनके लाल-लाल ओठोंमें श्वेत हासकी आभा तो देखो
[वह तो ऐसी जान पड़ती है] मानो चन्द्रमाकी किरण कमलमें
निवास करना चाहती हो; किन्तु उसका विचार निश्चित न होनेके
कारण वह बार-बार प्रकट होती एवं छिप जाती हो ॥ २ ॥ प्रभुकी
सुघड़ नासिका मानो तोतेकी सुन्दर चोंच है। उसे देखकर चित्त
अपार आश्चर्यचकित हो जाता है। अरे चतुर चित्त ! उनके
अमोल कपोल तथा महामधुर और मनोहर बोलोंपर रीझकर तू
अपनेको निछावर कर दे ॥ ३ ॥ देखो, इनके नेत्रकमल, कुटिल
केश, कुण्डल, भ्रुकुटि और सुन्दर ललाटपर तिलक शोभाके सार हैं।
मानो कामदेव प्रभुके रूपपर मोहित हो जानेके कारण अपनी ध्वजा-
के मकर, धनुष और बाण भूलकर चला गया हो ॥ ४ ॥ भगवान्के
रूपका वेद, शेष, शारदा, शुकदेव और भगवान् शंकर भी वर्णन करते-
करते पार नहीं पाते। फिर कहो, अत्यन्त मन्दमति, मूर्ख, कठोरहृदय
और गँवार तुलसीदास उसे किस प्रकार कह सकता है ? ॥ ५ ॥
राग ललित
[ १९ ]
आज रघुपति-मुख देखत लागत सुख ।
सेवक सुरूप, सोभा सरद-ससि सिहाई ।
दसन-बसन लाल, बिसद हास रसाल
मानो हिमकर-कर राखे राजीव मनाई ॥ १ ॥
अरुन नैन बिसाल, ललित भ्रुकुटि, भाल
तिलक, चारु कपोल, चिबुक-नासा सुहाई ।
बिथुरे कुटिल कच, मानहु मधु लालच अलि,
नलिन-जुगल ऊपर रहे लोभाई ॥ २ ॥