गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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राग केदारा
[ ८ ]
सखि ! रघुनाथ-रूप निहारु ।
सरद-बिधु रवि-सुवन मनसिजमानभंजनिहारु ॥ १ ॥
स्याम सुंदर सरीर जन-मन-काम-पूरनिहारु ।
बासचंदन मनहु मरकत-सिखर लसत निहारु ॥ २ ॥
रुचिर उर उपवीत राजत पदिक गजमनि-हारु ।
मनहु सुरधनु नखतगन बिच तिमिर-भंजनिहारु ॥ ३ ॥
विमल पीत दुकूल दामिनि-दुति-विनिंदनिहारु ।
बदन सुषमासदन सोभित मदन-मोहनिहारु ॥ ४ ॥
सकल अंग अनूप, नहिं कोउ सुकवि बरननिहारु ।
दासतुलसी निरखतहि सुख लहत निरखनिहारु ॥ ५ ॥
अरी सखि ! भगवान् रामका शरच्चन्द्र, अश्विनीकुमार तथा
कामदेवका मान-मर्दन करनेवाला रूप देख ॥ १ ॥ भक्तोंकी मनो-
कामना पूर्ण करनेवाले भगवान्के श्यामसुन्दर शरीरपर जो चन्दनका
लेप हो रहा है, वह ऐसा जान पड़ता है, मानो मरकतमणिके
शिखरपर कुहरा सुशोभित हो ॥ २ ॥ भगवान्के मनोहर वक्षःस्थलमें
यज्ञोपवीत, पदिक और गजमुक्ताओंका हार शोभायमान है, मानो
इन्द्रधनुष और नक्षत्रगणके बीचमें साक्षात् सूर्यदेव विराजमान हों
॥ ३ ॥ प्रभुका निर्मल पीताम्बर बिजलीकी कान्तिका तिरस्कार
करनेवाला है तथा उनका सौन्दर्यपूर्ण मुखमण्डल कामदेवको भी
मोहित करनेवाला है ॥ ४ ॥ भगवान्के सभी अङ्ग अनुपम हैं ।
उनका वर्णन कर सकनेवाला कोई सुकवि नहीं है । तुलसीदासजी