गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७ बालकाण्ड
राग जैतश्री
[ ४ ]
गावैं बिबुध बिमल बर बानी।
भुवन-कोटि-कल्यान-कन्द जो, जायो पूत कौसिला रानी ॥ १ ॥
मास, पाख, तिथि, बार, नखत, ग्रह, जोग, लगन सुभ ठानी।
जल-थल-गगन प्रसन्न साधु-मन, दस दिसि हिय हुलसानी ॥ २ ॥
बरषत सुमन, बधाव नगर-नभ, हरष न जात बखानी।
ज्यों हुलास रनिवास नरेसहि, त्यों जनपद-रजधानी ॥ ३ ॥
अमर, नाग, मुनि, मनुज सपरिजन बिगत बिषाद गलानी।
मिलेहि माँझ रावन रजनीचर लङ्क सङ्क अकुलानी ॥ ४ ॥
देव-पितर, गुरु-बिप्र पूजि नृप दिये दान रुचि जानी।
मुनि-बनिता, पुरनारि, सुआसिनि सहस भाँति सनमानी ॥ ५ ॥
पाइ अघाइ असीसत निकसत जाचक-जन भए दानी।
'ज्यों प्रसन्न कैकयी सुमित्रहि होउ महेस-भवानी' ॥ ६ ॥
दिन दूसरे भूप-भामिनि दोउ भईं सुमङ्गल-खानी।
भयो सोहिलो सोहिले मो जनु सृष्टि सोहिले-सानी ॥ ७ ॥
गावत-नाचत, जो मन भावत, सुख सों अवध अधिकानी।
देत-लेत, पहिरत-पहिरावत प्रजा प्रमोद-अघानी ॥ ८ ॥
गान-निसान-कुलाहल-कौतुक देखत दुनी सिहानी।
हरि-बिरञ्चि-हर-पुर सोभा कुलि कोसलपुरी लोभानी ॥ ६ ॥
आनँद-अवनि, राजरानी सब माँगहु कोखि जुड़ानी।
आसिष दै दै सराहहिं सादर उमा-रमा-ब्रह्मानी ॥ १० ॥
बिभव-बिलास बाढ़ि दसरथकी देखि न जिनहिं सोहानी।
कीरति, कुसल, भूति, जय, ऋधि-सिधि तिन्हपर सबै कोहानी ॥ ११ ॥