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सर्वकोश
गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)

Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 301

२६५ सुन्दरकाण्ड
[ ४ ]
सदल सलषन हैं कुसल कृपालु कोसल-राउ !
सील-सदन सनेह-सागर सहज सरल सुभाउ ॥ १ ॥
नींद-भूख न देवरहिं, परिहरेको पछिताउ ।
धीरधुर रघुबीरको नहि सपनेहू चित चाउ ॥ २ ॥
सोधु बिनु, अनुरोध रितुके, बोध बिहित उपाउ ।
करत हैं सोइ समय साधन, फलति बनत बनाउ ॥ ३ ॥
पठए कपि दिसि दसहु, जे प्रभुकाज कुटिल न काउ ।
बोलि लियो हनुमान करि सनमान, जानि समाउ ॥ ४ ॥
दई हौं संकेत कहि, कुसलात सियहि सुनाउ ।
देखि दुर्गं, बिसेषि जानकि, जानि रिपु गति आउ ॥ ५ ॥
कियो सीय-प्रबोध मुँदरी, दियो कपिहि लखाउ ।
पाइ अवसर, नाइ सिर तुलसीस-गुनगन गाउ ॥ ६ ॥
[यह सुनकर मुद्रिका कहने लगी—] कृपामय कोसलनाथ
अपने दल-बल और लक्ष्मणजीके सहित कुशलपूर्वक हैं। वे तो
स्वभावसे ही शीलके मन्दिर, स्नेह-समुद्र और सरलस्वभाव हैं ॥ १ ॥
तुम्हारे देवरको भी न नींद है और न भूख; उन्हें तुम्हें छोड़कर
चले जानेका बड़ा पश्चात्ताप है तथा धीरधुरन्धर रघुनाथजीके
चित्तमें तो स्वप्नमें भी प्रसन्नता नहीं है ॥ २ ॥ ऋतुके अनुरोधसे
[ अर्थात् वर्षा ऋतुके कारण ] तुम्हारी शोध (खोज) के लिये विहित
( उचित ) उपायोंका अवलम्बन नहीं किया जा सका था। अब
अवसर पाकर उन साधनोंका प्रयोग कर रहे हैं, जिनसे कार्य फलीभूत
हो जाय [ अर्थात् तुम्हारा पता लग सके ] ॥ ३ ॥ इसी विचारसे