गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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लिये पराग सुमनरस डोलत मलय-समीर ।
मनहु अरगजा छिरकत, भरत गुलाल-अबीर ॥ १६ ॥
काम कौतुकी यहि बिधि प्रभुहित कौतुक कीन्ह ।
रीझि राम रतिनाथहि जग-बिजयी बर दीन्ह ॥ १७ ॥
दुखवहु मोरे दास जनि, मानेहु मोरि रजाइ ।
'भलेहि नाथ', माथे धरि आयसु चलेउ बजाइ ॥ १८ ॥
मुदित किरात-किरातिनि रघुबर-रूप निहारि ।
प्रभुगुन गावत नाचत चले जोहारि जोहारि ॥ १९ ॥
देहिं असीस, प्रसंसहि मुनि, सुर बरषहिं फूल ।
गवने भवन राखि उर मूरति मंगलमूल ॥ २० ॥
चित्रकूट-कानन-छबि को कबि बरनै पार ।
जहँ सिय-लषनसहित नित रघुबर करहिं बिहार ॥ २१ ॥
तुलसिदास चाँचरि मिस कहे राम-गुनग्राम ।
गावहिं, सुनहिं नारि-नर पावहिं सब अभिराम ॥ २२ ॥
जो सीता, राम और लक्ष्मणको अत्यन्त प्रिय तथा तपस्वियोंका
निवासस्थान है, उस चित्रकूट-वनको देखकर मनमें बड़ा ही आनन्द
होता है ॥ १ ॥ वहाँ बड़ी ही सुहावनी, पवित्रकारिणी एवं पाप-
नाशिनी 'पयस्विनी' नामकी नदी है, जो सिद्ध, साधु और देवताओंसे
सेवित है और सम्पूर्ण मनोकामनाओंको पूर्ण कर देती है ॥ २ ॥
सघन और सुन्दर जातिके वृक्ष तथा लताएँ नवीन पल्लव और
पुष्पोंसे आच्छादित हैं तथा अगणित और अनेक प्रकारके कन्द-मूल
एवं जलथलके पौधे लगे हुए हैं ॥ ३ ॥ मनोहर बेत-बकुलसमुदाय
(मौलसिरी), कल्पवृक्ष, ताल, तमाल, कदली, कदम्ब, चम्पक,
पाटल, कटहल और आम्रके वृक्ष मानों छवि, अनुराग और सौभाग्य-