गीतावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ७ काण्ड सान्वय सटीक)
Gitavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६५ अयोध्याकाण्ड
[ २३ ]
पथिक गोरे-सांवरे सुठि लोने।
संग सुतिय, जाके तनुतें लही है द्युति सोन सरोरुह सोने॥ १ ॥
बय किसोर-सरि-पार मनोहर बयस-सिरोमनि होने।
सोभा-सुधा आलि ! अँचवहु करि नयन मंजु मृदु दोने॥ २ ॥
हेरत हृदय हरत, नहि फेरत चाह बिलोचन कोने।
तुलसी प्रभु किधौं प्रभुको प्रेम पढ़े प्रगट कपट बिनु टोने॥ ३ ॥
'ये सांवले-गोरे पथिक बड़े ही सुन्दर और सुहावने हैं इनके
साथ एक सुन्दर स्त्री है जिसके शरीरसे अरुणकमल और सुवर्णने
भी कान्ति पायी है॥ १ ॥ किशोरावस्थारूप सरिताको पाकर अब
'ये आयुशिरोमणि युवावस्थामें प्रवेश करनेवाले हैं। अरी आली ! अपने
नेत्रोंको मनोहर और मृदुल दोनों बनाकर इनकी छबिरूप अमृतका
पान करो॥ २ ॥ ये देखते ही हृदय हर लेते हैं और मनोहर नेत्र
कोने नहीं फेरते।' तुलसीदास कहते हैं कि प्रभु अथवा प्रभुका प्रेम
तो किसी प्रकारका दुराव न रखकर स्पष्ट ही टोना पढ़ता है॥३॥
[ २४ ]
मनोहरताके मानो ऐन।
स्यामल-गोर किसोर पथि दोउ, सुमुखि ! निरखु भरि नैन॥ १ ॥
बीच बधू बिधुबदनि बिराजति, उपमा कहुँ कोऊ है न।
मानहु रति ऋतुनाथ सहित मुनिबेष बनाए है मैन॥ २ ॥
किधौं सिंगार-सुखमा-सुप्रेम मिलि चले जग-चित-बित लैन।
अदभुत त्रयी किधौं पठई है बिधि मग-लोगन्हि सुख दैन॥ ३ ॥
सुनि सुचि सरल सनेहु सुहावने ग्रामबधुन्हके बैन।
तुलसी प्रभु तरु तर बिलंबे, किये प्रेम कनौड़े कें न ? ॥ ४ ॥