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सर्वकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

DevanagariHindipublished675 पृष्ठ

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  • गीता-संग्रह *

विभूतियोंका श्रवण किया है, उन्हें मैं जानता हूँ, सब नहीं जानते; क्योंकि सम्पूर्ण विभूति तो नारदजी भी नहीं जानते॥ १॥
त्वमेव तत्त्वतः सर्वा वेत्सि ता द्विरदानन।
निजं रूपमिदानीं मे व्यापकं चारु दर्शय॥ २॥
हे गजानन! आप ही उन सबको तत्त्वसे जानते हैं, इस समय आप अपना मनोहर और व्यापक रूप मुझे दिखाइये॥ २॥

श्रीगजानन उवाच
एकस्मिन् मयि पश्य त्वं विश्वमेतच्चराचरम्।
नानाश्चर्याणि दिव्यानि पुरा दृष्टानि केनचित्॥ ३॥
श्रीगणेशजी बोले—अकेले मुझमें ही तुम यह चराचर संसार देखो और अनेक प्रकारके दिव्य आश्चर्य देखो, जो पूर्वकालमें किसीने नहीं देखे हैं॥ ३॥
ज्ञानचक्षुरहं तेऽद्य सृजामि स्वप्रभावतः।
चर्मचक्षुः कथं पश्येन्मां विभुं ह्यजमव्ययम्॥ ४॥
मैं अपने प्रभावसे तुमको ज्ञाननेत्र देता हूँ, क्योंकि मुझ सर्वव्यापक, अजन्मा और अव्ययको चर्मचक्षु नहीं देख सकते॥ ४॥

ब्रह्मोवाच
ततो राजा वरेण्यः स दिव्यचक्षुरवैक्षत।
ईशितुः परमं रूपं गजास्यस्य महाद्भुतम्॥ ५॥
ब्रह्माजी बोले—तब वे राजा वरेण्य दिव्य दृष्टिको प्राप्त होकर भगवान् गणेशजीके महान् अद्भुत परमरूपको देखनेमें समर्थ हुए॥ ५॥
असंख्यवक्त्रं ललितमसंख्याङ्घ्रिकरं महत्।
अनुलिप्तं सुगन्धेन दिव्यभूषाम्बरस्रजम्॥ ६॥
असंख्यनयनं कोटिसूर्यरश्मिधृतायुधम्।
तद्वर्ष्मणि त्रयो लोका दृष्टास्तेन पृथग्विधाः॥ ७॥
असंख्य शोभायमान मुख, असंख्य सूँड एवं हाथ और सुगन्धिसे लिप्त, दिव्य भूषण, वसन और मालासे शोभित, असंख्य नेत्र, करोड़ों