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सर्वकोश
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

DevanagariHindipublished675 पृष्ठ

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१२ * गीता-संग्रह *


लिये ही पृथ्वीपर विचरते हैं॥ १७-१८॥
देहमात्रभृतो भूप समलोष्टाश्मकाञ्चनाः।
एतादृशा महाभाग्याः स्युश्चक्षुर्गोचराः प्रिय॥ १९॥
तमिदानीमहं वक्ष्ये शृणु योगमनुत्तमम्।
श्रुत्वा यं मुच्यते जन्तुः पापेभ्यो भवसागरात्॥ २०॥
प्रिय राजन्! वे केवल देहमात्रको ही धारण करनेवाले, मिट्टी-पत्थर तथा स्वर्णमें समान दृष्टि रखनेवाले—इस प्रकारके महाभाग पुरुष जिस योगके द्वारा दृष्टिगोचर हो जाते हैं, उस श्रेष्ठ योगको मैं तुमसे अब कहता हूँ; सुनो, जिसके श्रवण करनेसे प्राणी पापोंसे और भवसागरसे मुक्त हो जाता है॥ १९-२०॥
शिवे विष्णौ च शक्तौ च सूर्ये मयि नराधिप।
याभेदबुद्धिर्योगः स सम्यग्योगो मतो मम॥ २१॥
हे राजन्! शिव, विष्णु, शक्ति, सूर्य और मुझमें जो अभेदबुद्धिरूप योग है, उसीको मैं यथार्थ योग मानता हूँ॥ २१॥
अहमेव जगद्यस्मात्सृजामि पालयामि च।
कृत्वा नानाविधं वेषं संहरामि स्वलीलया॥ २२॥
मैं ही अपनी लीलासे अनेक वेष धारण करता हुआ इस जगत्की उत्पत्ति, पालन और संहार करता हूँ॥ २२॥
अहमेव महाविष्णुरहमेव सदाशिवः।
अहमेव महाशक्तिरहमेवार्यमा प्रिय॥ २३॥
हे प्रिय! मैं ही महाविष्णु, मैं ही सदाशिव, मैं ही महाशक्ति और मैं ही सूर्य हूँ॥ २३॥
अहमेको नृणां नाथो जातः पञ्चविधः पुरा।
अज्ञानान्मां न जानन्ति जगत्कारणकारणम्॥ २४॥
एकमात्र मैं ही मनुष्योंका स्वामी हूँ,