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सर्वकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 423, कुल 448 में से

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पृष्ठ 423

द्वादशः सर्गः—सुप्रीत-पीताम्बरः ३९१

वक्षस्थल पर सम्भ्रमपूर्वक जो विपरीत रति आरम्भ की,
उससे उनकी जघनस्थली निष्पन्द हो गयी, बाहें शिथिल हो
गयीं, वक्षःस्थल जोर-जोरसे काँपने लगा, आँखें बंद हो
गयीं—भला स्त्रियोंका पौरुष-रस-अभिलाष कैसे सफल हो
सकता है!
बालबोधिनी—जैसा कि पूर्वोक्त वर्णन करते हुए आ रहे
हैं, उसी वीरसंवलित शृङ्गारकी विवृत्ति करते हुए कहते हैं।
इस श्लोकके पूर्व श्लोकसे ही युक्त करना चाहिए।
रति-केलिसे संकुल रणके आरम्भमें वाम अंगमें वर्तमान
श्रीराधाके द्वारा सम्भ्रमपूर्वक स्मर-समर अभिनिवेशसे संयम
आदिके द्वारा कान्त पर विजय प्राप्त करनेके लिए जो कुछ
भी साहस किया, इससे वे पूर्ण रूपसे थक गयीं। जघन-स्थलीके
निष्पन्द होनेसे वह चलनेमें असमर्थ हो गयीं। दोनों भुजाओंकी
शिथिलताके कारण वे बन्धन-प्रहार करनेमें असमर्थ हो
गयीं। वक्षस्थल जोर-जोरसे कम्पित होने लगा। आँखें बन्द
हो गयीं और देखनेमें असमर्थ हो गयीं। किसीने ठीक ही
कहा—स्त्रियाँ अबला होती हैं, उनमें वीर रस किस प्रकारसे
आ सकता है? पौरुषत्वको अबलाएँ प्राप्त नहीं कर
सकतीं।
प्रस्तुत श्लोकको कुछ विद्वानोंके द्वारा 'पौरुषप्रेम विलास'
नामक प्रबन्ध माना गया है। इसमें शार्दूलविक्रीड़ित छंद,
संभोग-शृङ्गार रस तथा विशेषोक्ति अलंकार है।
तस्याः पाटल-पाणिजाङ्कितमुरो निद्राकषाये दृशौ
निर्धौतोधर-शोणिमा विलुलिताःस्रस्तस्रजो मूर्धजाः।
काञ्चीदाम दरश्लथाञ्चलमिति प्रातर्निखातै दृशो-
रेभिः कामशरैस्तदद्भुतमभूत्पत्युर्मनः कीलितम् ॥ ४ ॥
अन्वय—[अथ सुरतान्ते चिह्नशोभित-वपु-दर्शनेन प्रियस्य
प्रेमोत्सवमाह]—तस्याः (राधायाः) उरः (वक्षःस्थलं) पाटल-
पाणिजाङ्कितं (पाटलैः पाटलकुसुमवत् श्वेतरक्तैः पाणिजैः