गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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प्रकार सुशोभित हो रहा है, जैसे नीलकमल अपने पीले
परागसे परिपूर्ण रूपसे परिवेष्टित-मंडित हो रहा हो। इस
बातकी भी सूचना दी जा रही है कि श्याम-वर्णके
वक्षःस्थल पर तुम गौराङ्गीकी शोभा भी अत्यधिक होगी।
इस प्रकार विपरीत-रति भी प्रदर्शित हुई है।
तरल-दृगञ्चल-चलन-मनोहर-वदन-जनित-रतिरागम् ।
स्फुट-कमलोदर-खेलित-खञ्जन-युगमिव शरदि तडागम् ॥
हरि.... ॥४ ॥
अन्वय-तरल-दृगञ्चल-चलन-मनोहर-वदन-जनित-रतिरागम्
(तरलस्य चञ्चलस्य दृगञ्चलस्य चलनेन कटाक्षक्षेपेण मनोहरं
यत् वदनं तेन जनितः उत्पादितः रतिरागः सुरतौत्सुक्यं येन
तं) [अतएव] शरदि (शरतत्काले) स्फुटकम्लोदर-खेलित-
खञ्जनयुगम् (स्फुटं विकसितं यत् कमलं पद्मं तस्य उदरे
अभ्यन्तरे खेलितं क्रीडापरं खञ्जनयुगं यत्र तादृशं) तड़ागम्
इव [हरिं सा ददर्श इति शेषः]। [अत्र श्रीहरेः तड़ागेन
वदनस्य कमलेन, नयनयोश्च खञ्जनयुगलेन साम्यम्] ॥४॥
अनुवाद-जिन श्रीकृष्णका मनोहर वदन शरद् कालके
निर्मल सरोवरमें विकसित नील-कमलकी शोभाके समान है,
उस मुख पर चंचल नयनोंकी अपाङ्ग-भङ्गिमा श्रीराधाके
प्रति इस प्रकार मदन-अनुराग उद्दीप्त करा रही है, मानो
कमल पर खञ्जन पक्षी क्रीड़ापरायण हो रहे हों।
पद्यानुवाद-
तरल दृगंचल चलन मनोहर वदन उदित रति-राग,
खेल रहे खंजन कंजोदर मानो शरद तड़ाग।
हुलस उठी राधा मधुवनमें।
विलस उठी राधा अति मनमें ॥
बालबोधिनी-जब श्रीराधाने निकुंज-सदनमें प्रवेश किया,
तब श्रीकृष्णके नेत्र अति चंचल हो उठे, उनके मन्द-मन्द