गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाँपती हुई, कुछ उमगती हुई, इधर-उधर देखकर साभिलाष
श्रीगोविन्दको निहारती हुई, चरण-नूपुरोंको झंकारती हुई
प्रवेश किया। प्रविष्ट होते हुए जब उन्होंने श्रीकृष्णको देखा
तो उन्हें ऐसा लगा कि वे मानो अंग-अंगमें श्रीराधाको ही
धारण कर रहे हैं।
गीतम् ॥२२॥
वराड़ीरागयतितालाभ्यां गीयते।
बालबोधिनी—एक सुकेशी हाथोंमें कंकण धारण कर,
कानोंमें ढेरसे पुष्प धारणकर लजाई हुई-सी हाथमें चामर
लेकर वीजन करती हुई जब दयितके साथ विनोदन करती
है, ऐसे समयमें उस वराङ्गनाके गीतको वराड़ी राग कहा
गया है।
राधा-वदन-विलोकन-विकसित-विविध-विकार-विभङ्गम्।
जलनिधिमिव विधु-मण्डल-दर्शन-तरलित-तुङ्ग-तरङ्गम् ॥१॥
हरिमेकरसं चिरमभिलषित-विलासम्।
सा ददर्श गुरुहर्ष-वशंवद वदनमनङ्ग-निवासम् ॥ध्रुवपदम् ॥
अन्वय—[एवं कुञ्ज प्रवेशमुक्त्वा श्रीकृष्णस्य तद्दर्शनानन्द-
विकारान् वर्णयन् तस्या स्तद्दर्शनमाह]—सा (श्रीराधा) एकरसं
(एकस्मिन्नेव आलम्बने श्रीराधारूपे रसो यस्य तं; तस्याः
सर्वोत्तमत्व-निश्चयेन तदेकपरमित्यर्थः) [ननु अन्याङ्गनाभिः
रममाणस्य कुतस्तत्परत्वमित्यत आह]—चिरं (बहुकालं)
अभिलषित-विलासं (पूर्वोक्तरूपेण अभिलषितः आकाङ्क्षितः
तया सह विलासो येन तम्) [अतस्तत्प्रसादावलोकनात्]
गुरुहर्षवशंवद-वदनं (गुरुहर्षस्य वशंवदम् आयत्तं वदनं मुखं
यत्र तादृशं हर्षेण स्मेराननमित्यर्थः) [अतएव] अनङ्गविकाशं
(अनङ्गस्य कामस्य विकाशः यत्र तादृशं) [तदेकनिष्ठत्वं