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सर्वकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 358, कुल 448 में से

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पृष्ठ 358

३२६ श्रीगीतगोविन्दम्
अन्वय-अयि तन्वि (कृशाङ्गि), तव दृशौ (नयने)
मदालसे (मदजन्यहर्षेण अलसे मन्थरे) [स्वर्गे तु एकैव
मदालसानाम्नी अङ्गना; ममाङ्गना त्वं तु दृग्रूपे द्वे मदालसे
धारयसि]; वदनम् इन्दुसन्दीपनं (इन्दुः चन्द्रः तस्य सन्दीपनं
शोभावृद्धिकरं चन्द्रादपि समधिक-शोभासम्पन्नमित्यर्थः) [स्वर्गेऽपि
इन्दुसन्दीपनी-नाम्नी काचिदस्ति]; (तव) गतिः (गमनं) जनमनोरमा
(जनस्य मम मनोहारिणी) [स्वर्गेऽपि जनमनोरमा इति काचित्]
ऊरुद्वयं (जघन-युगलं) विजितरम्भम् (विजिता तिरस्कृता
रम्भा कदली येन तत् कदल्या अपि समधिकशोभामयम्)
[स्वर्गेऽपि रम्भानाम्नी काचित्]; तव रतिः (सुरतविहारः)
कलावती (सुकौशलवती) [स्वर्गेऽपि कलावतीनाम्नी काचित्
विद्यते]; भ्रुवौ च रुचिरचित्रलेखे (रुचिरा मनोज्ञा चित्रा
चमत्कारिणी लेखा ययोस्तादृशौ) [स्वर्गेतु एका एव चित्र-लेखा];
अहो त्वं [क्षीणापि] पृथ्वीगता (भूतलस्था) [अपि] विबुध-यौवतं
(देवयुवतीसमूहम्) वहसि (धारयसि) ॥६॥
पद्यानुवाद-
अवनी-अप्सरी! अलस नेत्रमयि! वदन इन्दु तव शोभे।
गति मनहर, रति पटु, रम्भा-उरु, चित्रलिखित भौं लोभे ॥
अनुवाद-हे तन्वि ! आश्चर्य है, धरणि तलमें अवस्थिता
होकर भी तुम स्वर्गस्था विद्याधरियोंके समान प्रतीत हो रही
हो, तुम्हारे नयन सिन्धु मदालसाके मदसे अलस हो रहे हैं।
तुम्हारा वदन विबुध-रमणी इन्दु सन्दीपनीके समान है।
तुम्हारा गमन देववनिता मनोरमाके समान मनोहर है, तुम्हारे
उरुद्वयने सुरयोषिता रम्भाको भी पराजित कर दिया है।
तुम्हारा रति-कौशल स्वर्गस्था कलावतीके समान विविध
कौशलयुक्ता है और तुम्हारे भ्रूयुगल चित्रलेखाके समान
मनोहारी एवं विचित्र हैं।
बालबोधिनी-हे तन्वि राधिके ! यद्यपि तुम इस पृथ्वी
पर अवस्थित हो, फिर भी ऐसा लगता है जैसा समस्त