गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमः सर्गः-विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २८३
मलिन-मन होता है, वही अपने आश्रित व्यक्तिके साथ छल
कर सकता है। मैं तो पहलेसे ही काम-शरोंसे पीड़िता हूँ,
कमसे कम इस स्थितिमें तो धोखा नहीं देना चाहिए। जाओ
छलिया! तुम यहाँसे चले जाओ। कोई शुद्ध अन्तःकरण
वाला व्यक्ति ऐसा कभी नहीं कर सकता।
श्रीकृष्णने कहा-राधे ! मुझपर व्यर्थ ही शंका मत
करो, मैं कभी भी तुम्हारी वञ्चना नहीं कर सकता हूँ।
भ्रमति भवानबला-कवलाय वनेषु किमत्र विचित्रम्।
प्रथयति पूतनिकैव वधू-वध-निर्दय-बाल-चरित्रम् ॥
हरि हरि याहि माधव..... ॥७॥
अन्वय-[न वञ्चयाम्यहं त्वमेव मुधा शङ्कसे इत्यत
आह]-भवान् अबला-कवलाय (अबलानां कवलाय ग्रासाय
कान्तावाधायेति यावत्) वनेषु भ्रमति अत्र [विषये] किं
विचित्रं [न किमपीत्यर्थः]; [अत्र उदाहरणमाह]-पूतनिका
(पूतना) एव वधु-वध-निर्दय-बालचरित्रं (वधुवधे नारीहत्यायां
निर्दयं बालचरित्रं) [कियत्] प्रथयति (विस्तारयति) [नतु
सर्वमित्यर्थः]; [बाल्ये चेदेवं कैशोरे किमत्र विचित्रमिति भावः] ॥७॥
अनुवाद-आप अबलाओंका बध करनेके लिए ही
वन-वनमें भ्रमण कर रहे हो, इसमें आश्चर्य ही क्या है!
बाल्य-चरित्रमें ही आपने पूतनाका वध करके अपने निर्दय
निष्ठुर स्वभावका परिचय दिया है, नारीबधपरायणता तो
आपके चरित्रमें है ही।
पद्यानुवाद-
अबला-वधकी साध लिये, तुम वन वन डोल रहे हो।
बालचरितका प्रथम पृष्ठ क्या फिरसे खोल रहे हो? ॥
हे माधव! हे कमल-विलोचन! वनमाली! रसभीने!
अपनी व्यथाहारिणीके ढिग जाओ हे परलीने!।।
बालबोधिनी-पुनः श्रीराधाने कहा-यह तो आपकी
स्वभावसिद्धता ही है कि वनोंमें आप अबलाओंको 'ग्रसने'