गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमः सर्गः-विलक्ष्यलक्ष्मीपतिः २७७
कज्जल-मलिन-विलोचन-चुम्बन-विरचित-नीलिम-रूपम्।
दशन-वसनमरुणं तव कृष्ण! तनोति तनोरनुरूपम्॥
हरि हरि याहि माधव.....॥२॥
अन्वय-[त्वच्चिन्तयैव जागरानेत्रे मे रागः, नतू अन्यस्या
रतिरागादितिचेत् तत्राह]-हे कृष्ण, कज्जल-मलिन-विलोचन-
चुम्बन-विरचित-नीलिमरूपम् (कज्जलेन मलिनयोः विलोचनयोः
नेत्रयोः तस्या इति शेषः, चुम्बनेन विरचितं नीलिमरूपं यत्र
तादृशं) तव अरुणं (सहजलोहितं) दशनवसनं (अधरः)
[अधुना] तनोः (तव शरीरस्य) अनुरूपं (सदृशरूपं
श्यामतामित्यर्थः) तनोति (व्यनक्ति) [हरि हरि याहि माधव
याहीत्यादि सर्वत्र योजनीयम्]॥२॥
अनुवाद-आपकी दशन-पंक्तिके-वसन स्वरूप अरुण
वर्णके सुन्दर अधर व्रजयुवतियोंके काजलसे अञ्जित नयनोंके
चुम्बन करनेसे कृष्णवर्ण होकर आपके शरीरके अनुरूप ही
कृष्णताको प्राप्त हो रहे हैं।
पद्यानुवाद-
उसकी कजरारी आँखोंके चुम्बनसे हैं काले।
अरुण अधर ये छली! तुम्हारे, दीख रहे मतवाले॥
बालबोधिनी-श्रीराधा अपने अन्तरमें खण्डिताका आरोप
करके बड़े मर्मभेदी व्यङ्गवाणोंसे माधवको भेदने लगती
हैं-कृष्ण! कपटताकी आवश्यकता नहीं है। यदि तुम यह
कहते हो कि दूसरी किसी भी रमणीके साथ मैंने रात नहीं
बितायी है तो ये आँखें इतनी लाल-लाल क्यों हो रही हैं?
उसी अनुरागिणीके प्रति अभी भी तुम्हारा प्रेम तुम्हारी
आँखोंमें झलक रहा है। श्रीकृष्ण कहने लगे-प्रिये! मैं सच
कहता हूँ कि मैंने किसी भी रमणीके साथ रात्रि जागरण
नहीं किया, अलसताके कारण मेरी आँखें बन्द हो रही हैं।
श्रीराधा कहने लगीं-पुनः यह तुम्हारे लाल अधर काले क्यों
हो रहे हैं? तुम्हारे शरीरके अनुरूप रातभर उसकी काजल-अँजी