गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७४ श्रीगीतगोविन्दम्
हरि हरि याहि माधव याहि केशव मा वद कैतववादं
तामनुसर सरसीरुहलोचन या तव हरति विषादम् ॥ध्रुवम् ॥१ ॥
अन्वय—रजनि-जनित-गुरु-जागर-राग-कषायितम् (रजन्यां
जनितेन गुरुणा दीर्घेण जागरेण जागरणेन यो रागस्तेन,
तस्यामनुरागेण च कषायितं लोहितीकृतं) [तथा] अलसनिमेषं
(अलसेन निमेषः निमीलनं यत्र तं) [तथाच] उदितरसाभिनिवेशं
(उदितः प्रकटितः रसाभिनिवेशः तस्याः सुरते अभिनिवेशः
येन तथाभूतं) तव नयनं स्फुटम् (अभिव्यक्तम्) अनुरागं
बहतीव (धारयतीव); [तां प्रति तव हृदि स्थितोऽनुरागः
प्राचुर्यात् अरविन्दचक्षुषा निर्गत इव प्रतीयते इति भावः]; हे
माधव [त्वं] याहि, हे केशव [त्वं] याहि [द्विरुक्त्या कोपाधिक्यं
सूचितम्]; कैतववादं (त्वदेकपरायणोऽहमिति कपटवचनं) मा
वद; हे सरसीरुहलोचन (कमललोचन; दृष्टिपातमात्रेणैव
मुग्धस्त्रीजनवञ्चनपरायण इत्यभिप्रेत्यर्थः) हरि हरि (खेदे)
[त्वत्तोऽपि वञ्चनचतुरा] या [सहजप्रेमानभिज्ञस्य] तव विषादं
(कापट्यापादितवैमनस्यं) हरति, ताम् (तव चित्तानुरूपचतुरव्यापारां
कान्ताम्) अनुसर (अनुगच्छ) ॥१ ॥
अनुवाद—हे हरि ! (अपनी सुललित नयन-भङ्गिमासे
अबलाओंके मनको हरण करनेवाले) मुझे खेद है। हे
माधव ! जाओ ! हे केशव ! चले जाओ ! तुम झूठ मत
बोलो ! जो तुम्हारे दुःखका हरण कर सकती है, तुम उसीके
पास चले जाओ ! रात्रिमें बहुत अधिक जागरणके कारण
अलसतामय मन्द-मन्द निमीलित, रति रसावेश संयुक्त आरक्त
नयन उस ब्रजसुन्दरीके प्रति प्रबलानुरागको अभी भी
प्रकाशित कर रहे हैं।
पद्यानुवाद—
नैश जागरणसे रतनारी बनी सखे ! हैं आँखें।
रह-रहकर झप-झप उठती है मृदु पलकोंकी पाँखें ॥