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सर्वकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 448 में से

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सप्तमः सर्गः-नागर-नारायणः २६५
पद्यानुवाद-
सजल जलद सम फुल्ल वदनके।
कनक-निकष सम पीत वसनके ॥
सकल युव जन श्रेष्ठ तरुणके।
प्रेरक कवि 'जय' काव्य करुणके ॥
मिले, जिसे हैं सरस भावसे, उसे, कभी वनमाली।
विरह, स्वजन-स्वर-व्यङ्ग-दरद-सब जला न पाते आली ॥
बालबोधिनी—जयदेव कविके द्वारा माधवके उद्देश्यसे
गाये गये इस प्रबन्धसे प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण हृदयमें प्रवेश
करें। किसके हृदयमें? श्रीराधाके हृदयमें। साथ ही कर्ण-रन्ध्र
द्वारा मेरे-कवि जयदेवके, इस प्रबन्धके पाठकोंके तथा
श्रोताओंके भावरूपी हृदय-कमलमें भी प्रवेश करें। नागर
नारायण हरि हृदयमें अवस्थित हों।
इस प्रकार नारायणमदनायास नामका सोलहवाँ प्रबन्ध
समाप्त हुआ।
मनोभवानन्दन चन्दनानिल !
प्रसीद रे दक्षिण ! मुञ्च वामताम्।
क्षणं जगत्प्राण ! विधाय माधवं।
पुरो मम प्राणहरो भविष्यसि ॥१॥
अन्वय—[अत्यावेशेन मनोवाष्पमुद्गिरति दैन्येनाधुना
मलयानिलं सविनयं प्रार्थयते]—हे मनोभवानन्दन (आनन्दयतीति
आनन्दनः; मनोभवस्य आनन्दनः तत्सम्बुद्धौ हे मदनानन्दकर)
हे चन्दनानिल (मलयवायो) प्रसीद (प्रसन्नो भव);
[पुनरीर्याद्यादाह]—रे दक्षिण (सरल-स्वभाव, सर्वानुकूल इति
यावत्) वामतां (प्रतिकूलतां) मुञ्च (त्यज) [दक्षिणपथप्रवृत्तस्य
वाम-पथ प्रवृत्तेरयुक्तत्वात् वामता त्याज्य इति भावः]; [तर्हि
किं विधेयं तत्राह]-[जगद्धितोऽपि मनोभवानन्दनाय चन्दनतरु-
सम्पर्कात् विषमश्चेत् मां मारयसि तर्हि] हे जगत्प्राण ! क्षणं