गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमः सर्गः—नागर-नारायणः २३७
अथ चतुर्दशः सन्दर्भः।
गीतम् ॥१४॥
वसन्तरागयतितालाभ्यां गीयते।
अनुवाद—यह चौदहवाँ प्रबन्ध वसन्त राग तथा यति
तालके द्वारा गाया जाता है।
समर-समरोचित-विरचित-वेशा,
दलित-कुसुम-दर विलुलित केशा।
कापि मधुरिपुणा
विलसति युवतिरधिकगुणा ॥१॥ध्रुवम्
अन्वय—हे सखि स्मर-समरोचित-विरचित-वेशा (स्मरसमरस्य
उचितो विरचितो वेशो यया सा) [ततश्च रणावेशेन] दलित-
कुसुम-दर-विलुलित-केशा (दलितानि विमर्दितानि कुसुमानि
येभ्यः तादृशाः दरविलुलिताः ईषद्विस्रस्ताः केशा यस्याः तादृशी)
कापि अधिकगुणा (मत्तेऽपि अधिकगुणवती) युवतिः मधुरिपुणा
सह विलसति ॥१॥
अनुवाद—सखि! मदन-समरके योग्य वेशभूषाका परिधान
किये हुए और अनङ्ग-रसके आवेशमें कबरी-बन्धन आलुलायित
होने (बिखर जाने) के कारण कुसुमसमूह विगलित होनेसे
विमर्दित केशोंवाली मुझसे भी अधिक गुणशालिनी कोई
युवती मधुरिपुके साथ सुखपूर्वक विलास कर रही है।
पद्यानुवाद—
स्मर-समरोचित-विरचित-वेशा।
गलित-कुसुम-वर-विलुलित-केशा ॥
शोभित है युवती री कोई।
हरि से विलास रही जो खोई ॥
बालबोधिनी—आशंकिता श्रीराधा सखीसे कहती हैं—हे
सखि ! मुझसे भी अधिक कोई सुन्दर रमणी काम-संग्रामके
अनुकूल वेश धारणकर मधुरिपुके साथ विलास कर रही है।