सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 243, कुल 448 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 243

षष्ठः सर्गः—धृष्ट-वैकुण्ठः २११
द्वादशः सन्दर्भः।
गीतम् ॥१२ ॥
गुणकरी रागेण रूपकतालेन गीयते।
यह बारहवाँ प्रबन्ध गुणकरी राग तथा रूपक तालद्वारा
गाया जाता है।
पश्यति दिशि दिशि रहसि भवन्तम्।
तदधर-मधुर-मधूनि पिवन्तम् ॥
नाथ हरे! सीदति राधाऽऽवासगृहे ॥१ ॥ध्रुवपदम्
अन्वय—[राधा] रहसि (एकान्ते) दिशि दिशि (प्रतिदिशं)
तदधरमधुर-मधूनि (तस्याः एव राधायाः अधरस्य मधुराणि
मधूनि) पिवन्तं भवन्तं पश्यति; हे नाथ हरे, [त्वयि
अनुरक्ततया सन्ताप एवानुभूतस्तया इति नाथशब्दः, त्वया च
तस्या लज्जाधैर्यादि-हरणात् हरिशब्दोऽपि प्रयुक्तः] राधा वासगृहे
(सङ्केतभवने) सीदति (त्वदागमनप्रतीक्षया क्रमशः अवसन्ना
भवति) [त्वन्मयं जगत् प्रतिभाति तस्याः तथापि त्वं मनसापि
तां न स्मरसीति सन्तापकत्वमेवेत्यर्थः] ॥१ ॥
अनुवाद—हे नाथ ! हे हरे ! श्रीराधा अपने आवास गृहमें
सीझ रही हैं, अत्यन्त दुःखी हो रही हैं, स्वाधरके मधुर
सुधापानमें सकुशल आपको मन-ही-मन सकल दिशाओंमें
देख रही हैं।
पद्यानुवाद—
पल-पल दिशि दिशि देख रही है
मधुर अधर रस पीते,
कहाँ दूर हो, कहाँ निकट हो
हे मेरे मनचीते ?
हे हरि, राधा आवास गृहे
कब तक वियोगका त्रास सहे ॥
बालबोधिनी—श्रीराधाकी चेष्टाओंका वर्णन करती हुई