गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७४ श्रीगीतगोविन्दम्
प्रस्तुत श्लोकमें शार्दूलविक्रीड़ित नामक छन्द है। दीपक
अलङ्कार है। विप्रलम्भ शृङ्गार-रस है। नायक अनुकूल
अथवा दक्षिण है। नायिका उत्कण्ठिता है। सखी कहती है
जो नायिकाकी सहायिका है।
स्मरातुरां दैवत-वैद्य-हृद्य! त्वदङ्गसङ्गामृतमात्रसाध्यम्।
निवृत्तबाधां कुरुषे न राधामुपेन्द्र! वज्रादपि दारुणोऽसि ॥२॥
अन्वय—हे दैवतवैद्यहृद्य, (देववैद्यादपि हृदयङ्गम! वैद्याभ्यास-
कृत्यनिपुण इति वा) त्वदङ्गसङ्गामृतमात्रसाध्यां (तव अङ्गसङ्ग
एव अमृतं तन्मात्रेण साध्यां प्रतिकार्यां) स्मरातुरां (कामार्त्तां)
राधां [यदि] विमुक्त-बाधां (रोगमुक्तां) न कुरुषे (तर्हि) हे
उपेन्द्र, त्वं वज्रादपि दारुणः (कठोरः) असि (भवसि) [यद्वा
त्वम् उपेन्द्रवज्रादपि इन्द्रवज्रात् उप अधिकम् उपेन्द्रवज्रं तदपि
चेद्भवोत् तस्मादपि, दारुणः असि]। [अङ्गसङ्ग-मात्र-साध्य-
कर्माकरणेन काठिन्यमेव ते पर्यवसितमित्यर्थः] ॥२॥
अनुवाद—देववैद्य अश्विनीकुमारसे भी सुनिपुण सुचिकित्सक
श्रीकृष्ण! हे उपेन्द्र! अनङ्गतापसे पीड़िता श्रीराधा एकमात्र
आपके अङ्ग-संयोग रूप औषधामृतसे ही जीवन धारण कर
सकती हैं। उस दुःसाध्य रोगवाली कामातुर श्रीराधाको इस
मुमुर्षु दशामें यदि आप बाधा-रहित नहीं बनाते हैं तो
निश्चय ही आप वज्रसे भी कठोर समझे जायेंगे।
पद्यानुवाद—
वैद्य! रसौषधि दे उसको अब फिरसे चेतन कर दो
इङ्गित-भाषिणिकी जिह्वामें फिरसे वाणी भर दो॥
स्पृशामृतसे 'स्मर'-बाधाको हे हरि! सत्वर हर लो।
काँप रही हूँ—कहीं न उरको, निठुर वज्र सा कर लो॥
बालबोधिनी—सखीने श्रीकृष्णको दो विशेषणोंसे विभूषित
किया—
(१) दैवतवैद्यहृद्य—श्रीकृष्णकी अभिरामता एवं मनोरमता
स्वर्गलोकके वैद्य अश्विनीकुमारोंसे भी बढ़कर है।