गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)
Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary
महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५६ श्रीगीतगोविन्दम्
अनुवाद—हे माधव ! विविध विलासोंसे रमणीय कुसुम-शय्या
श्रीराधाके द्वारा रचायी जा रही है, जो कामदेवके बाणोंकी
शय्याके समान प्रतीत हो रही है। आपके गाढ़ आलिङ्गनकी
प्राप्तिकी आशासे वह कठोर-शरशय्याव्रतके अनुष्ठानका
पालन कर रही है।
बालबोधिनी—हे श्रीकृष्ण ! महान केलि-कला-विलासरूप
पुष्प-शय्याकी रचना आपके विरहमें विदग्ध होकर श्रीराधा
करती तो हैं, पर वह सेज काम-शरोंकी सेज सदृश ही है।
उत्प्रेक्षा करते हुए सखी कहती है—जैसे कोई व्यक्ति किसी
बड़े सुखकी प्राप्तिके लिए कोई व्रत करता है, उसी प्रकार
श्रीराधा भी दुष्प्राप्य आपके आलिङ्गन-सुखकी प्राप्तिके लिए
दुष्कर शरशय्या-व्रतकी साधना कर रही है।
वहति च चलित-विलोचन-जलभरमानन-कमलमुदारम्।
विधुमिव विकट-विधुन्तुद-दन्त-दलन-गलितामृतधारम्॥
सा विरहे तव दीना... ॥४॥
अन्वय—[किञ्च] वलित-विलोचन-जलधरं (वलितानि
अविरतं गलितानि विलोचनयोः नेत्रयोः जलानि धारयतीति
तथोक्तम्) उदारम् (विकस्वरम्) आननकमलं (मुखपद्मं)
विकट-विधुन्तुद-दन्त-दलन गलितामृतधारं (विकटस्य करालस्य
विधुन्तुदस्य राहोः दन्तदलनेन चर्वणेन गलिता अमृतधारा
यस्मात् तं) विधुम् (चन्द्रम्) इव बहति (रोदितीति भावः;
तेन च वदनमस्याः निष्पीडितसुधासारं सुधाकरमिव
सम्भावयामि) ॥४॥
अनुवाद—जैसे कराल राहुके दशनसे संदशित होकर
सुधांशुसे पीयूषधारा स्रवित होती है, वैसे श्रीराधाके उत्कृष्ट
मुखकमलके चञ्चल नेत्रोंसे अनवरत नयन-वारि विगलित
हो रहा है।