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सर्वकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 448 में से

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पृष्ठ 153

द्वितीयः सर्गः—अक्लेश-केशवः १२१
दुरालोकः स्तोक-स्तवक-नवकाशोक-लतिका-
विकासः कासारोपवन-पवनोऽपि व्यथयति।
अपि भ्राम्यद्भृङ्गी रणित-रमणीया न मुकुल-
प्रसूतिश्चूतानां सखि शिखरिणीयं सुखयति ॥२॥
अन्वय—[इदानीं विरहव्याकुलतां दर्शयति]—सखि, [अधुना]
स्तोकस्तवक-नवकाशोक-लतिका-विकासः (स्तोकस्तवका
अल्पगुच्छा या नवका नवपुष्पिता अशोककलतिका तस्याः
विकासः) दुरालोकः (उद्दीपकत्वात् नितरां दुर्दर्शः); [तथा]
कासारोपवन-पवनोऽपि (कासारः सरोवरः तेन सम्पृक्तं यत्
उपवनं तस्य पवनोऽपि [एतेन वायोः शैत्यसौगन्ध्यमान्द्यगुणो
ध्वनितः] व्यथयति (सन्तापयति); [तथा] भ्राम्यद्भृङ्गी-रणित-
रमणीया (भ्राम्यन्तीनां भृङ्गीणां रणितैः गुञ्जितैः रमणीया
मनोहारिणी) शिखरिणी (प्रशस्ताङ्कुरसमन्विता) इयं चूतानां
(आम्राणां) मुकुलप्रसूतिः (मुकुलोद्गमः) अपि न सुखयति
[अपितु सन्तापयत्येव; अधुना अशोकोऽपि शोकदायी, समीरणोऽपि
पीडकः; रमणीयापि उद्वेगकरीति—अहो विरहवैपरीत्यम्] ॥२॥
अनुवाद—सखि ! श्रीकृष्णके विरहमें मेरा मन अब
किसी भी प्रकारसे परितृप्त नहीं हो रहा है। देखो ! यह ईषत्
विकसित अशोककी नयी लताकी प्रफुल्ल शोभा मेरे
नयनोंका शूल बन गयी है। इस सरोवरके समीप स्थित
उपवनोंसे आनेवाली समीरण (बयार) भी मेरा अङ्ग-अङ्ग
दुःखा रही है। चारों ओर भ्रमण करनेवाले भौरोंके सुन्दर
गुञ्जन भी अच्छे नहीं लग रहे हैं। उनके गुञ्जनसे मनोज्ञ
बने हुए वृक्षोंके अग्रभागमें निकले हुए आमोंके नये-नये
बौर भी मुझे सुखी नहीं बनाते।
पद्यानुवाद—
मुझे जलाते हैं अशोकके कोमल किशलय फूल।
बहने वाला मृदु समीर भी, छू उपवन सर-कूल॥