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सर्वकोश
गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

गीतगोविन्दम् (महाकवि जयदेव - सम्पूर्ण १२ सर्ग व २४ अष्टपदी सटीक)

Gita Govinda of Jayadeva with Hindi Commentary

महाकवि जयदेव / पं. रामचन्द्र मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished448 पृष्ठ

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पृष्ठ 107

प्रथमः सर्गः—सामोद-दामोदरः ७५
कापि विलास-विलोल-विलोचन-खेलन-जनित-मनोजं।
ध्यायति मुग्धवधूरधिकं मधुसूदन-वदन-सरोजम्—
[हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥३॥]
कापि कपोलतले मिलिता लपितुं किमपि श्रुतिमूले।
चारु चुचुम्ब नितम्बवती दयितं पुलकैरनुकूले—
[हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥४॥]
केलि-कला-कुतुकेन च काचिदमुं यमुनावनकुले।
मञ्जुल-वञ्जुल-कुञ्जगतं विचकर्ष करेण दुकूले—
[हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥५॥]
करतल-ताल-तरल-वलयावलि-कलित-कलस्वन-वंशे।
रासरसे सहनृत्यपरा हरिणा युवतिः प्रशंससे—
[हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥६॥]
श्लिष्यति कामपि चुम्बति कामपि कामपि रमयति रामां।
पश्यति सस्मित-चारुतरमपरामनुगच्छति बामां॥७॥
[हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥७॥]
श्रीजयदेव-भणितमिदमद्भुत-केशव-केलि-रहस्यं ।
वृन्दावन-विपिने ललितं वितनोतु शुभानि यशस्यम् ॥
[हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे... ॥८॥]
नीचे प्रत्येक पद्य, अन्वय, श्लोकानुवाद, पद्यानुवाद तथा
बालबोधिनी व्याख्या दी जा रही है—
चतुर्थ प्रबन्धके श्लोक रामकिरी राग तथा यति तालसे
गाये जाते हैं।
चन्दन-चर्चित-नील-कलेवर पीतवसन-वनमाली
केलिचलन्मणि-कुण्डल-मण्डित-गण्डयुग-स्मितशाली
हरिरिह-मुग्ध-वधुनिकरे
विलासिनी विलसति केलिपरे ॥१॥ध्रुवम् ॥