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घाट रामायण (सन्त तुलसी साहब हाथरस - आध्यात्मिक एवं रहस्यवादी राम-तत्त्व काव्य)

Ghat Ramayan of Sant Tulsi Sahib Hathras

सन्त तुलसी साहब (हाथरस) द्वारा

DevanagariHindipublished150 पृष्ठ

घट रामायण / १५७
॥ उत्तर धर्मा। अष्टक १ ॥
जल नीर निरमल मिष्ट। हिमकर बासनं ॥१॥
धार ते भंडार भौ के। चरन श्रीपति चर्चनं ॥२॥
सोइ पूजि पावै सेव सुखदाता। दुरियत कर्म के खंडनं ॥ ३ ॥
श्रीपारसनाथ जप सूरज जैनराई। मूल नायक बंदनं ॥४॥
तुम चंद्र बदनी। चंदा पूरी परमेसुरा ॥५॥
अर्थ-चन्द्रमा की किरणों से बासित जल निर्मल एवं मीठा है श्रीपति द्वारा पूजित आपके चरण इस
भव सागर के लिए भंडार की धारा हैं। उसकी पूजा तथा सेवा करके सेवक सुख प्राप्त करते हैं और
उनके कर्म जनित पाप नष्ट हो जाते हैं। जैन मुनियों के सूर्य की पारसनाथ जी जप सृष्टि रचना कर्त्ता के
नायक की वन्दना है। हे आत्मा? तुम चन्द्रबदनी हो-और परमेश्वर की पुरी चन्द्रा पुरी है? श्रेष्ठ ऋषभ
देवता कैलास गिरि पर निवास करते हैं और मैं उनके चरण कमलों को हृदय में धारण करता हूँ ॥ १ ॥
॥ अष्टक २॥
कुमकुम जो मंजन सगर केसर। मलयागिरि घिसि चंदनं ॥१॥
अकल दुख्ख निरवार भौ के। चरन श्रीपति चर्चनं ॥ २ ॥
सोइ पूजि पावै सेव सुखदाता। दुरियत कर्म के खंडनं ॥ ३ ॥
श्रीपारसनाथ जप सूरज जैनराई। मूल नायक बंदनं ॥ ४ ॥
अर्थ-केशर और कुमकुम से पूरी तरह से मंजन करके और मलयगिरि के चंदन को घिस करके
इस भवसागर के अकल्पनीय (अकाल) कष्टों को समाप्त करने वाला श्रीपति जी के चरणों का यह
चर्चित रूप है। उस सुख देने वाले श्री पारसनाथ जी को पूजा एवं सेवा करके कर्म के पापों का खण्डन
होता है। श्री पारसनाथ जी जैनियों में परमश्रेष्ठ हैं और उन श्री पारसनाथ का जाप करो-इन जैनधर्म के
मूलनायक का शरीर सूर्य की भाँति (प्रकाश वान) है।
॥ अष्टक ३॥
बेल फूल चमेलि चंपा। काम कामोदिनि केतकी ॥ १ ॥
तास परमल बास ऊधौ। अगर आगर सेवती ॥ २ ॥
सोइ पूजि पावै सेव सुखदाता। दुरियत कर्म के खंडनं ॥ ३ ॥
श्रीपारसनाथ जप सूरज जैनराई। मूल नायक बंदनं ॥ ४ ॥
अर्थ-बेला, चमेली, चंपा, कुमोदनी, केतकी, इनके सुवास से नितान्त निर्मल परागयुक्त-
अगरबत्तियों के ढेर से सुवासित उन्हीं चरणों की सेवा करके सुख मिलता है और दूषित कर्मफल
खंडित होते हैं। श्री पारसनाथ जी का जप करो, जैनधर्म के इन मूलनायक का शरीर सूर्य की भाँति
चमक रहा है।
॥ अष्टक ४॥
खरि खरेला दाख खिरनी। आम स्त्रीफल लाइया ॥ १ ॥
नारियल नौरंग केला। प्रभुजी के चरन चढ़ाइया ॥ २ ॥
मोरी इतनी बिनती दयाल कौं। प्रभुनाथ के गुन गाइया ॥ ३ ॥