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सर्वकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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प्रेतकल्प ] और्ध्वदेहिक क्रियामें विहित पद आदि विविध दानोंका फल ५५१


पूज्य हो जाता है। वह शुद्धात्मा अपने कुलमें द्योतित होता है और प्रकाशस्वरूपको प्राप्त करता है।

हे खगेश! देवालयमें पूर्वाभिमुख, ब्राह्मणके लिये उत्तराभिमुख तथा प्रेतके निमित्त दक्षिणाभिमुख होकर सुस्थिर दीपकका दान जलसे संकल्पपूर्वक करना चाहिये। इस संसारमें जो सभी प्रकारके उपहारोंसे युक्त तेरह पददान मृत व्यक्तिके लिये तथा जीवित दशामें अपने लिये करता है, वह महान् कष्टोंसे मुक्त होकर महापथकी यात्रा करता है। आसन, पात्र और भोजन जो ब्राह्मणको देता है, वह उसीके पुण्यसे सुखपूर्वक खाता-पीता हुआ महापथको पार करता है। कमण्डलुका दान देनेसे प्यासा प्रेत जल प्राप्त करता है। प्रेतका उद्धार करनेके लिये एकादशाहको पात्र, वस्त्र, पुष्प तथा अँगूठीका दान देना चाहिये। इसी प्रकार प्रेतका शुभेच्छु बनकर जो पुत्र यथाशक्ति तेरह पदोंका दान करता है, उससे प्रेतको प्रसन्नता प्राप्त होती है। भोजन, तिल, जलपूर्ण तेरह घट, अँगूठी तथा उत्तरीय एवं अधोवस्त्रका जो दान देता है, उस दानके पुण्यसे प्रेत परम गतिको प्राप्त करता है।

जो अश्व, नौका अथवा हाथीका दान ब्राह्मणको देता है वह उसी देय वस्तुकी महिमाके अनुसार उन-उन सुखोंको प्राप्त करता है। जो मनुष्य भैंसका दान देता है, वह नाना प्रकारके लोकोंमें विचरण करता है। यमदूतोंके हर्षवर्धनके लिये ताम्बूल और पुष्पका दान देना चाहिये, इससे संतुष्ट होकर वे दूत उस प्रेतको कष्ट नहीं देते।

प्राणीको यथाशक्ति गौ, भूमि, तिल तथा स्वर्णका दान अवश्य करना चाहिये, ऐसा मनीषियोंने कहा है। जो व्यक्ति मृत प्राणीके लिये जलसे परिपूर्ण मिट्टीका पात्र दान करता है, उसे हजार जलपूर्ण पात्रके दानका फल प्राप्त होता है। यमराजके दूत महाक्रोधी, महाभयंकर आकृतिवाले, काले तथा पीले वर्णके हैं; वे वस्त्र-दान किये जानेपर मृत प्राणीको यमलोकमें कष्ट नहीं देते। तृषा और श्रमसे पीड़ित होकर महापथमें आगे बढ़ता हुआ प्रेत अन्न और जलसे पूर्ण घटका दान देनेसे निश्चित ही सुखी हो जाता है। दक्षिणा, अस्त्र, शस्त्र, वस्त्र तथा विष्णुकी स्वर्ण-प्रतिमासे युक्त शय्याका दान भी ब्राह्मणको देना चाहिये। ऐसा करनेसे प्रेतयोनिका परित्यागकर प्राणी स्वर्गमें देवताओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक निवास करता है।

हे तार्क्ष्य! यह अन्त्येष्टि-कर्ममें होनेवाला दान मैंने तुमसे कहा। मृत प्राणी अन्य शरीरमें कैसे प्रवेश करता है, अब मैं उसको कहूँगा।

‘हे परंतप! मृत्युलोकमें जन्म लेनेवाले प्राणीकी मृत्यु निश्चित है, इसलिये अपने-अपने धर्मके अनुसार मृत व्यक्तिका श्राद्धादिक कृत्य करना चाहिये। हे खगेश्वर! मरे हुए प्राणियोंके मुखमण्डलसे पहले जीवात्मा वायुका सूक्ष्म रूप धारण करके निकल जाता है। लोगोंके नेत्र आदि नौ द्वार, रोम तथा तालुरन्ध्रसे भी जीवात्मा बाहर हो जाता है; किंतु जो पापी हैं उनका जीवात्मा अपान-मार्गसे शरीर छोड़ता है’—

जातस्य मृत्युलोके वै प्राणिनो मरणं ध्रुवम्।
मृतिः कुर्यात् स्वधर्मेण यास्यतश्च परंतप॥
पूर्वकाले मृतानां च प्राणिनां च खगेश्वर।
सूक्ष्मो भूत्वा त्वसौ वायुर्निर्गच्छत्यास्यमण्डलात्॥
नवद्वारै रोमभिश्च जनानां तालुरन्ध्रके।
पापिष्ठानामपानेन जीवो निष्क्रामति ध्रुवम्॥
(३१। २५-२७)

प्राणवायुके निकल जानेपर शरीर पृथ्वीपर वैसे ही गिर पड़ता है, जैसे वायुके थपेड़ोंसे आहत होकर निराधार वृक्ष भूमिपर गिर पड़ता है। मृत्युके बाद शरीरमें स्थित पृथ्वीतत्त्व पृथ्वीमें, जलतत्त्व