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सर्वकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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काण्ड ] \hfill सिध्म, अर्श, मूत्रकृच्छ्र, अजीर्ण तथा गण्डमाला आदि रोगोंकी औषधियाँ \hfill ३३९


सिध्म, अर्श, मूत्रकृच्छ्र, अजीर्ण तथा गण्डमाला आदि रोगोंकी औषधियाँ

श्रीहरिने कहा—[हे चन्द्रचूड़] हल्दी और केलेके क्षारका लेप सिध्मरोगका विनाशक है। एक भाग कूट तथा दो भाग हरीतिकीका चूर्ण उष्ण जलके साथ पान करनेसे कमरका शूल रोग दूर हो जाता है। हरीतिकी, शर्करा और पिप्पलीका चूर्ण नवनीतके साथ सेवन करनेसे वह अर्श-रोगका विनाश करता है। जंगली अडूसेके पत्तोंको घीमें मन्द-मन्द आँचपर पकाकर उसका लेप करना अर्शरोग दूर करनेकी श्रेष्ठतम औषधि है।

गुग्गुल और त्रिफलाका चूर्ण पानकर भगंदर रोगको विनष्ट किया जा सकता है। जीरा, अदरक, दही तथा चावलके माँड़को अग्निमें पकाकर नमकके साथ सेवन करना चाहिये। इससे मूत्रकृच्छ्र नामक रोग दूर होता है। यवक्षार तथा शर्करा भी मूत्रकृच्छ्र-रोगको दूर करता है।

तिलके तेलमें यवको जलाकर उसकी कज्जली बनानी चाहिये। उसके बाद तिलके ही तेलमें उसको मिलाकर अग्निसे जले हुए स्थानपर लेप करनेसे लाभ होता है। घीके सहित लाजवन्ती तथा शरपुंखाकी पत्तियोंका तैयार किया गया लेप भी अग्निजन्य पीड़ाको दूर करता है। निम्न मन्त्रसे अभिमन्त्रित करके इस लेपका प्रयोग करना चाहिये—

ॐ नमो भगवते ठ ठ छिन्धि छिन्धि ज्वलनं प्रज्वलितं नाशय नाशय हुं फट्॥ (१८४।८)

हाथमें निर्गुण्डीकी जड़ बाँधनेसे ज्वर बहुत ही शीघ्र दूर हो जाता है। श्वेत गुञ्जाफलको सात खण्ड बनाकर उसको हाथमें बाँध लेनेसे अर्श रोग निश्चित ही विनष्ट हो जाता है। विष्णुक्रान्ता (अपराजिता) तथा बकरीके मूत्रका प्रयोग करके चोर और व्याघ्रादि हिंसक जीवोंके प्रहारसे प्राणी अपनी रक्षा कर सकता है। ब्रह्मदण्डीकी जड़ तो सभी कर्मोंमें सिद्धि प्रदान करनेवाली है।

घृतके साथ सिद्ध त्रिफलाका चूर्ण कुष्ठविनाशक है। पुनर्नवा, बिल्व और पिप्पलीके चूर्णसे सिद्ध घृतके द्वारा हिचकी, श्वास तथा खाँसीको दूर किया जा सकता है। इस घृतका पान स्त्रियोंके लिये गर्भकारक होता है।

दूध और घीके साथ वानरी बीज (केवाँच)-को पकाकर घी तथा शर्करामें मिलाकर सेवन करनेसे वीर्य कभी नष्ट नहीं होता।

मधु, घृत तथा दुग्धका पान बलीपलित नामक रोगको दूर करता है।

हे शिव! मधु, घृत, गुड़, करेलेका रस और ताँबेको एक साथ अग्निमें पकानेपर चाँदी बन जाता है। अब आप सोना बनानेकी विधि सुनें।

पीले धतूराका पुष्प और सीसा एक पल तथा लाङ्गलिका (करियारी)-की शाखाको एक साथ मिलाकर अग्निमें पकानेपर सोना बन जाता है।

हे हर! धत्तूरके बीजोंसे निकाले गये तेलद्वारा प्रज्वलित दीपकके प्रकाशमें समाधिस्थ व्यक्तिको देवता भी नहीं देख पाते।

हे शिव! मनुष्यको मदमस्त हाथीके दोनों नेत्रोंमें अपने हाथसे काजल लगाना चाहिये। ऐसा करनेपर वह व्यक्ति युद्धमें विजय प्राप्त करता है और महाबलवान् भी बन जाता है।

डुण्डुभ नामक सर्पके दाँतको मुखमें रखकर मनुष्य जलके बीच भी पृथ्वीके समान ही किसी अन्य विकल्पका आश्रय लिये बिना रह सकता है।

लौहचूर्ण और मट्ठा पान करनेसे पाण्डुरोगका शमन हो जाता है। तण्डुलीयक (चौलाई) तथा