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सर्वकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

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पृष्ठ 303

काण्ड ] विसर्परोगका निदान २१३

उपेक्षा करनेपर जो अतिशय शोथ बढ़ जाता है, वह बहुत क्लेशप्रद होता है। इस रोगको कुम्भकामला कहा जाता है। पित्त यदि हरित और श्यामवर्णका है तो उससे पाण्डुरोग होता है, उस स्थितिमें वात-पित्तके प्रभावसे चक्कर आना, तृष्णा, स्त्रियोंके प्रति अरुचि, थोड़ा-थोड़ा ज्वर, तन्द्रा, अग्निमान्द्य और अतिशय आलस्य—ये सभी रोगके लक्षण व्यक्त हो जाते हैं। इस रोगको हलीमक नामसे जाना जाता है।

पाण्डुरोगसे उत्पन्न सभी उपद्रवोंमें शोथ प्रधान है। इसलिये शोथका वर्णन किया जाता है। वायु कुपित होकर रक्त, पित्त और कफको दूषित करनेके कारण वह त्वक्, शिरा और मांसका आश्रय लेकर ऊँचाई पैदा करता है। सभी शोथ त्रिदोषज होते हैं, क्योंकि सूजन वात, पित्त और कफ—इन तीनोंसे होती है। इसलिये जैसे वातिक, पैत्तिक, श्लेष्मिक कारण-भेदसे शोथ नौ प्रकारका होता है—वातपैत्तिक, वातश्लैष्मिक, पित्तकफज, सन्निपातिक, अविघातक, विषज और एकाङ्गज। निज और आगन्तुक-भेदसे यह दो प्रकारका होता है—सर्वाङ्गज और एकाङ्गज। विस्तृत, उन्नत, अग्रभाग गाँठदार होनेसे इसके अवान्तर तीन भेद हैं।

पैत्तज शोथ पीतवर्ण, कृष्णवर्ण या रक्तवर्णका होता है एवं यह शोषणकारी होता है। यह बहुत जल्दी शान्त नहीं होता। इस शोथके उत्पन्न होनेसे पूर्व शरीरमें दाह उत्पन्न होता है। तृष्णा, दाह, ज्वर, पसीना, भ्रम, क्लेद, मद—ये सभी उपद्रव इसमें होने लगते हैं। इस रोगमें रोगीको शीत वस्तुकी इच्छा होती है, मलभेद हो जाता है, दुर्गन्धि होती है, स्पर्श नहीं सहा जाता और कोमलता होती है। कफज शोथमें खुजली होती है। रोम और चमड़ेमें पीलापन, कठोरता, शीतलता, गुरुता, स्निग्धता, कोमलता, स्थिरता और पीड़ा होती है। इस रोगमें निद्रा, मन्दाग्नि, वमन—ये सभी उपद्रव हो जाते हैं।

आघात—अस्त्र-शस्त्रादिकृत छेदन-भेदनसे क्षत होनेपर अभिघातज शोथ होता है। शीतल वायु तथा समुद्रीवायु और भल्लातक-रसके लग जाने एवं केंवाच इत्यादिके लग जानेसे जो सूजन होती है, वह फैल जाती है। यह अत्यन्त गरम लाल रंगका और पित्तज शोथके लक्षणोंसे युक्त होती है।

विषधर³ प्राणीके किसी अङ्गके ऊपरसे चलनेपर अथवा किसी अङ्गमें मूत्र करनेपर और विषहीन प्राणीके भी दाढ़, दाँत एवं नखके द्वारा घात करनेपर उस स्थानमें जो शोथ उत्पन्न होता है, वही विषज शोथ है। इसके अतिरिक्त विषधर प्राणीके विष्ठा, मूत्र, शुक्र आदिसे सने हुए वस्तुके सम्पर्कसे, विषवृक्षके वायुके सेवनसे, विषयुक्त वस्तु शरीरपर मलनेसे विषशोथरोग उत्पन्न होता है। विषजशोथ कोमल, गतिशील, अवलम्बी, शीघ्र दाह और शूलको उत्पन्न करनेवाला होता है। नये और उपद्रवरहित शोथ साध्य होते हैं और पहले कहे हुए असाध्य होते हैं। (अध्याय १६२)


विसर्परोगका निदान

धन्वन्तरिने कहा—हे सुश्रुत ! अब मैं विसर्पादि रोगोंके मूल कारणोंका वर्णन कर रहा हूँ, उसे आप सुनें।

वात, पित्त, कफ एवं अभिघात नामक दोषोंसे तथा पित्त, रक्त एवं कफके दूषित होनेसे शोथ-सदृश विसर्परोग होता है। बाह्य, अन्तः, उभय—ये उसके तीन अधिष्ठान हैं। इनमें अपने-अपने प्रकोपक तथा विदाहकारी कारणोंसे शरीरमें शीघ्र विसर्पण


१-सु०उ०तं०अ० ४४, मा०नि०पाण्डुप्र० २२, २३। २-च०चि०अ० १२, च०सू०अ० १८, सु०चि०अ० २३।