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सर्वकोश
गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 9, कुल 421 में से

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पृष्ठ 9

ग्रन्थमाला संपादकीय
पढ़ना, लिखना और गिनना ये मनुष्य की मौलिक विद्यायें मानी गई हैं । जैन-शास्त्रों में जिन
बहत्तर कलाओं का उल्लेख मिलता है उनमें सर्वप्रथम स्थान लेख का और दूसरा गणित का है । तथापि
आगमों में प्रायः इन कलाओं को 'लेहाइयाओ गणितप्पहाणाओ' अर्थात् लेखादिक, किन्तु गणित प्रधान
कहा गया है । इससे सिद्ध होता है कि बालक की शिक्षा में एवं मानवीय व्यवहार में गणित का बड़ा
महत्त्व था ।
जैन-साहित्य यद्यपि धर्म व दर्शन प्रधान है, तथापि उसमें गणित-शास्त्र का उपयोग व व्याख्यान
पद पद पर पाया जाता है । विशेषतः इस साहित्य के चार अनुयोग—प्रथम, करण, चरण और द्रव्य माने
गये हैं । उनमें करणानुयोग में लोक का स्वरूप वर्णित पाया जाता है; और उस निमित्त से सूर्य, चन्द्र व नक्षत्र
तथा द्वीप, समुद्र आदि के विवरणों में गणित की नाना प्रक्रियाओं का प्रचुरता से उपयोग किया गया है ।
सूर्यप्रज्ञप्ति, चन्द्रप्रज्ञप्ति एवं जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति नामक उपाङ्गों में तथा तिलोयपण्णत्ति, षट्खंडागम की धवल
टीका एवं गोम्मटसार व त्रिलोकसार तथा उनकी टीकाओं में प्रचुरता से गणित का प्रयोग पाया जात
है; और वह भारतीय प्राचीन गणित के विकास को समझने के लिये बड़ा महत्त्वपूर्ण है । सूर्यप्रज्ञप्ति को
तो गणितानुयोग भी कहा गया है । वैदिक परम्परा में गणित का विषय वेदाङ्ग ज्योतिष आदि ज्योतिष
के ग्रंथों में प्रयुक्त पाया जाता है । पाँचवीं शती में हुए आर्यभट ही एक सर्वप्रथम ज्योतिषी पाये जाते हैं
जिन्होंने अपने आर्याष्टशत नामक कृति में ३३ श्लोकात्मक गणित का एक प्रकरण स्वतंत्र रूप से जोड़ा
है । उनके पश्चात् हुए ब्रह्मगुप्त ने भी अपने ब्राह्म स्फुट सिद्धान्त नामक ग्रंथ में गणित का एक अध्याय
जोड़ा है ।
इस समस्त परम्परा में एक भी ऐसा ग्रंथ नहीं दिखाई देता जो पूर्णतः गणित-विषयक कहा जा
सके । ऐसा सर्वप्रथम ग्रंथ महावीराचार्य कृत गणितसार-संग्रह ही है जिसकी रचना राष्ट्रकूट नरेश अमोघवर्ष
के राज्यकाल में हुई थी जो सन् ८१३ से ८८० ईस्वी तक पाया जाता है । यह राजा जैनधर्म का बड़ा
अनुरागी था और उसके संरक्षण में बहुत से जैन साहित्य की रचना हुई । राजा स्वयं एक कवि था और
प्रश्नोत्तर-रत्न-मालिका नामक प्रख्यात सुभाषित कविता उसी की बनाई सिद्ध होती है । प्रस्तुत ग्रंथ की
उत्थानिका में ही अमोघवर्ष की बड़ी प्रशंसा की गई है । यहाँ जो उन्हें महान् यथाख्यात-चारित्र-जलधि
आदि विशेषण दिये गये हैं उनपर से ऐसा अनुमान होता है कि उन्होंने राज्यत्याग कर मुनिधर्म धारण किया
था । रत्नमालिका के अन्त में जो उन्हें 'विवेकात् त्यक्तराज्येन' कहा है उससे भी इसी बात का समर्थन
होता है । (देखिये डॉ० ही० ला० जैन, राष्ट्रकूट नरेश अमोघवर्ष की जैन-दीक्षा, जैन सिद्धान्त भास्कर,
आरा, १९४३) । एक पूर्णतः गणित विषयक ग्रंथ ऐसा भी मिला है जो आश्चर्य नहीं महावीराचार्य से