गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation
महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा
पृष्ठ 310, कुल 421 में से
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२५६ ] गणितसारसंग्रहः [ ८. २०३-
सूचीमुखवद्वेधे परिखा मध्ये तु परिखार्धम् ।
मुखसहितमथो करणं प्राग्वत्तलसूचिवेधे च ॥ २०३२ ॥
अत्रोद्देशकः
त्रिभुजचतुर्भुजवृत्तं पुरोदितं परिखया परिक्षिप्तम् ।
दण्डाशीत्या व्यासः परिखाश्चतुरुर्विकास्त्रिवेधाः स्युः ॥ २१३२ ॥
आयतचतुरायामो विंशत्युत्तरशतं पुनर्न्यासः ।
चत्वारिंशत् परिखा चतुरुर्विका त्रिवेधा स्यात् ॥ २२३२ ॥
ऊपर की ओर घटने वाले अथवा बढ़ने वाले अंतोंसहित केन्द्रीय पुंज के (ऐसे खातों के
संबंध में) कर्मांतिक को प्राप्त करने के लिये खात की आधी चौड़ाई को केन्द्रीय पुंज की चौड़ाई में
जोड़ते हैं । औण्ड्रफल को प्राप्त करने करने के लिये खात की चौड़ाई के मान को केन्द्रीय पुंज की
चौड़ाई में जोड़ते हैं । तत्पश्चात् पूर्वोक्त विधि उपयोग में लाते हैं ॥ २०३२ ॥
उदाहरणार्थ प्रश्न
पूर्व कथित त्रिभुजाकार, चतुर्भुजाकार और वृत्ताकार क्षेत्रों के चारों ओर खाइयाँ खोदी जाती हैं ।
चौड़ाई ८० दंड है, और खाईयाँ ४ दंड चौड़ी और ३ दंड गहरी हैं। घनाकार समाई बतलाओ
॥ २१३२ ॥ आयत की लंबाई १२० दंड और चौड़ाई ४० दंड है। आसपास की खाई चौड़ाई में ४ दंड
और गहराई में ३ दंड है। घनाकार समाई बतलाओ ॥ २२३२ ॥
करना पड़ता है । त्रिभुजाकार और वृत्ताकार छेद वाले खातों के संबंध में उपर्युक्त सूत्र केवल सन्निकट
फलों को देते हैं । इस प्रकार प्राप्त खात की कुल लम्बाई की सहायता से, नतितल वाली खातों के संबंध
में गाथा ९ से ११३२ में दिये गये नियम का प्रयोगकर, घन फलों (घनाकार समाई) का मान निकालते हैं ।
(२२३२) मिट्टी का केन्द्रीय पुंज का छेद आयताकार हो, तो वेष्टित खात की कुल लंबाई को
निकालने के लिये भुजाओं के मापों को खात की चौड़ाई अथवा आधी चौड़ाई द्वारा बढ़ाकर, जोड़ने से
(क्रमशः कर्मांतिक अथवा औण्ड्र ) इष्ट फल प्राप्त करते हैं ।
इस श्लोक में वर्णित किये गये प्रश्न ये हैं : (अ) उलटाए गये स्तूप या शंकु (cone) की
कुल ऊँचाई निकालना, (ब) जब किसी काटे गये स्तूप या शंकु की ऊँचाई और ऊपरी तथा नीचे के
तलों का विस्तार दिया गया होता है, तब इष्ट गहराई पर छेद (section) के विस्तार को निकालना ।
तुलनात्मक अध्ययन के लिये त्रिलोक प्रज्ञप्ति (१/१५४, ४/१७९७) तथा जम्बूद्वीप प्रज्ञप्ति (१/२७, २८)
देखिये। यदि वर्गाकार आधारवाले खंडित (काटे गये) स्तूप में आधार की भुजा का माप ‘अ’, ऊपरी तल
की भुजा का माप ‘ब’ और ऊँचाई ‘उ’ हो, तो यहाँ दिये गये नियमानुसार, कुल स्तूप की ऊँचाई ऊ लेकर
ऊ = (अ x उ)/(अ - ब), और किसी दी गई ऊँचाई उ₁ पर स्तूप के छेद की भुजा का माप = (अ(ऊ - उ₁))/ऊ
होता है । ये सूत्र शंकु के लिये भी प्रयोज्य होते हैं । स्तूप के बिन्दुरूपी भाग को बनानेवाले छेद की भुजा
का माप, नियमानुसार, दूसरे सूत्र के हर ऊ में जोड़ा जाता है, क्योंकि कुछ दशाओं में स्तूप वास्तव में
बिन्दु में प्रह्रासित नहीं होता । जहाँ वह बिन्दु में प्रह्रासित होता है, वहाँ इस भुजा का माप शून्य
लेना पड़ता है ।