सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

गणितसारसंग्रह (महावीराचार्य - प्रो. लक्ष्मीचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Ganitasarasangraha of Mahaviracharya with Hindi Translation

महावीराचार्य (अनुवादक: प्रो. एल. सी. जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 421 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 20

प्रस्तावना
भारतीय गणित इतिहास के जगत्प्रसिद्ध गणितज्ञ महावीराचार्य के गणितसार संग्रह ग्रन्थ का पुन-
रुद्धार प्रोफेसर रंगाचार्य द्वारा सन् १९१२ में हुआ । इस ग्रन्थ के तीन अपूर्ण हस्तलेख उन्होंने गव्हर्नमेंट
ओरिएंटल मेनस्क्रिप्ट्स लायब्रेरी, मद्रास में, उस समय के डी. पी. आई. श्री जी. एच. स्टुअर्ट की प्रेरणा
से प्राप्त किये । उन तीन हस्तलिपियों में से एक तो १ ग्रंथ की लिपि में कागज पर है, जिसमें संस्कृत टीका
सहित प्रथम पांच अध्याय हैं। बाकी दो हस्तलिपियां २ ताड़पत्रों पर कन्नड़ी लिपि में हैं। एक ताड़पत्र में प्रथम
पांच अध्याय हैं, और दूसरे में सात अध्याय हैं, जिनमें क्षेत्रफलों का ज्यामितीय विधि से निरूपण है । इन
दोनों हस्तलिपियों में संस्कृत में लिखा हुआ मूल ग्रंथ है, और कन्नड़ी भाषा में कुछ विविध उदाहरणार्थ प्रश्न
तथा उन्हीं प्रश्नों के उत्तर दिये गये हैं । इस ग्रंथ का पूर्णरूपेण अंग्रेजी में अनुवाद करने के लिये प्रोफेसर
रंगाचार्य ने कई जगह खोज करवाई, जिसके फल स्वरूप उन्हें कुछ और हस्तलिपियां प्राप्त हुईं । चौथी
हस्तलिपि गव्हर्नमेंट ३ ओरिएंटल लायब्रेरी, मैसूर में प्राप्त हुई । यह हस्तलिपि मूल रूप में ताड़ पत्र पर किसी
जैन पंडित के पास थी, जिसे कागज पर कन्नड़ी में उतारा गया था । इस लिपि में पूरा ग्रन्थ है, साथ में,
वल्लभ द्वारा कन्नड़ी भाषा में की गई टीका भी है । वल्लभ ने उसी में लिखा है कि इसी ग्रन्थ की टीका
उन्होंने तेलगू में भी की। पांचवीं हस्तलिपि, ४ दक्षिण कन्नड़, मूडबिद्री में एक जैन मंदिर के भांडार में ताड़-
पत्र पर कन्नड़ी में लिखित प्राप्त हुई । इसमें भी पूर्ण ग्रंथ है तथा कन्नड़ी में प्रश्न और उनके उत्तर दिये
गये हैं । ग्यारहवीं सदी में राजमुंद्री के राजराजेन्द्र के शासन काल में इस ग्रंथ का अनुवाद पावलुरि मल्हण
द्वारा तेलगू में हुआ, जिसकी कुछ हस्तलिपियां मद्रास की गव्हर्नमेंट ओरिएंटल मेनस्क्रिप्ट्स लायब्रेरी में हैं ।
ग्रन्थ पढ़ने से ज्ञात होता है कि ग्रन्थकार सम्भवतः ईसा की नवीं सदी में मैसूर प्रांत के किसी
कन्नड़ी भाग में हुए होंगे, जहां राष्ट्रकूट वंश के चक्रिका भंजन राजा अमोघवर्ष नृपतुंग ५ का शासन था ।
महावीराचार्य के कार्य का महत्व समझने के लिये गणित के विकास के इतिहास पर विहंगम दृष्टि डालना
आवश्यक प्रतीत होता है । गणित के विकास में भारतीयों का कितना अंशदान था यह भी इससे स्पष्ट
हो जावेगा । इस विकास विवरण को हम केवल महावीर के काल तथा पश्चिम के देशों तक सीमित रखेंगे ।
१. इस हस्तलिपि को प्रोफेसर रंगाचार्य ने “P” द्वारा अभिधानित किया है । हम भी इन्हीं संकेतों
को उपयोग में लावेंगे ।
२. दोनों हस्तलिपियों में साधारण लक्षण होने एवं विषय अतिछादी (overlapping) न होने
के कारण इन्हें “K” द्वारा अभिधानित किया गया है ।
३. इसका अभिधान “M” द्वारा किया गया है ।
४. इस हस्तलिपि को “B” द्वारा अभिधानित किया गया है ।
५. अमोघवर्ष नृपतुंग के विषय में इतिहासकारों का मत है कि वे ईसा की नवीं सदी के पूर्वार्द्ध में
राजगद्दी पर बैठे । इनके विशेष परिचय के लिये नाथूराम प्रेमी का “जैन साहित्य और इतिहास”
१९४२, पृ० ५१७ आदि देखिये ।