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सर्वकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 656 में से

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पृष्ठ 75

उ०ख०-अ०१६] * सृष्टि-वर्णन, मधु-कैटभकी उत्पत्ति * ७३
हुए अपनी-अपनी बुद्धिसे सृजन करो ॥ ५ ॥
उन सब [सातों मानस पुत्रों]-ने उन (ब्रह्माजी)-
की बात सुनकर तपस्या करनेका निश्चय किया और
अत्यन्त दीर्घकालतक तपस्या करके परब्रह्मको प्राप्त हो
गये ॥ ६ ॥
तब प्रजापति ब्रह्माजीने अन्य सात पुत्रोंकी सृष्टि
की, वे अत्यन्त ज्ञानसम्पन्न थे, परंतु उन्होंने उत्तम सृष्टि
नहीं की ॥ ७ ॥
तब उन सनकादि पुत्रोंको [सृष्टिकार्यमें उदासीन]
देखकर उन्होंने स्वयं सृष्टि-रचना प्रारम्भ की। कमलासन
ब्रह्माजीने मुखसे ब्राह्मणों और अग्निको जन्म दिया ॥ ८ ॥
उन्होंने भुजाओं, जंघाओं और पैरोंसे अन्य तीन
वर्णों [क्रमशः क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र]-की सृष्टि की।
उन्होंने अपने हृदयसे चन्द्रमाको, नेत्रोंसे सूर्यको, कानोंसे
वायु तथा प्राणको, नाभिसे अन्तरिक्षको, सिरसे द्युलोकको,
पैरोंसे भूमिको तथा कानोंसे दिशाओं एवं अन्य लोकोंको
प्रादुर्भूत किया ॥ ९-१० ॥
तदनन्तर स्थावर-जंगमात्मक इस विश्वमें उच्च
और निम्न स्थानों, समुद्रों, सरिताओं, पर्वतों, तृणों, गुल्मों
(झाड़ियों) और वृक्षोंकी सृष्टि की ॥ ११ ॥
हे नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर कुछ दिन बीतनेके बाद
महाविष्णुके निद्रित होनेपर उनके कानोंसे दो महान्
असुर उत्पन्न हुए ॥ १२ ॥
तीनों भुवनोंमें विख्यात उन दोनों [महासुरों]-के
नाम मधु और कैटभ थे। वे विकराल दाढ़ों, भयंकर मुख,
पीली आँखों और दीर्घ नासिकावाले थे ॥ १३ ॥
वे दोनों विशालकाय, वज्रदेहवाले और पर्वतके
सदृश ऊँचे थे। अत्यन्त घमण्डी वे दोनों वर्षाकालीन
मेघकी भाँति गर्जन कर रहे थे ॥ १४ ॥
उन दोनों दुष्टोंने बहुत-से अपशब्दोंका प्रयोगकर
उन ब्रह्माजीको धिक्कारा और विप्रों, देवताओं, ऋषियों,
साधुओं और शास्त्रोंकी निन्दा की ॥ १५ ॥
उन दोनोंके शब्द (गर्जन)-से पृथ्वी और शेष
काँपने लगे। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उनकी ध्वनिसे उद्विग्न हो
गया ॥ १६ ॥
तब वे दोनों क्रोधसे आँखें लाल किये हुए उन
ब्रह्माजीको खानेके लिये उद्यत हो गये। तब चिन्ता और
हर्षसे युक्त उन कमलासन ब्रह्माने सम्यक् रूपसे यह
विचारकर कि गजानन गणेशजीकी कृपासे विष्णुके
हाथसे इन दोनोंका वध होगा, मधु-कैटभके नाश और
श्रीहरिके प्रबोधनके लिये विष्णुभगवान्‌के नेत्रोंमें स्थित
विष्णुमोहनकारिणी वरप्रदायिनी निद्रादेवीका स्तवन
किया ॥ १७-१९ ॥
ब्रह्माजी बोले- [हे देवि!] आप [देवताओंको
हव्य प्रदान करनेवाली] स्वाहारूपा, [पितरोंको कव्य
प्रदान करनेवाली] स्वधारूपा और अमृतस्वरूपा हैं।
आप ही मात्रा, अर्धमात्रा और स्वररूपिणी भी हैं। आप
ही सृष्टिकी कर्त्री, हर्त्री और लोकजननी हैं। आप ही
सत् और असत्शक्तिरूपा हैं ॥ २० ॥
आप श्रुतिरूपा, स्वरस्वरूपा, कालरात्रि, जन्म-
मृत्युसे रहित, रात्रिरूपा, जगज्जननी, जगद्धात्री और
सृष्टि, पालन एवं संहार करनेवाली हैं ॥ २१ ॥
हे पर्वतराजपुत्री! आप ही सावित्री, सन्ध्या, महामाया,
क्षुधा और तृषारूपिणी हैं। आप ही सम्पूर्ण प्राणि-
पदार्थोंमें निहित उनकी शक्ति हैं। [हे देवि! हे
महालक्ष्मीरूपिणि!] आपके स्वामी तीनों लोकोंके कर्ता,
दैत्यों और दानवोंके संहारक और ज्ञान-विज्ञानवान् हैं;
ऐसे उन श्रीहरिके नेत्रोंमें निद्रा व्याप्त है ॥ २२-२३ ॥
जिन [श्रीहरि]-के द्वारा जगत्‌की उत्पत्ति, उसका
पालन और संहार किया जाता है; आपके द्वारा उन्हें भी