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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 642, कुल 656 में से

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पृष्ठ 642

६४० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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जो मनुष्य अनेक वर्षोंतक ग्रीष्म-ऋतुमें पंचाग्नि- | जाता है ॥ ६१ १/२ ॥
साधन (चारों ओर अग्नि और ऊपर सूर्यके आतपका | मथुरापुरी, हरिद्वार, बदरिकाश्रम, सेतुबन्धतीर्थ, कुरुक्षेत्र
सेवन करते हुए तपश्चरण), हेमन्त-ऋतुमें जलवासन | और श्रीशैलक्षेत्र—इनमें [तपस्या करनेका] जो फल
(कण्ठ या नाभिपर्यन्त जलमें स्थित रहना) और वर्षा- | होता है, उससे कोटिगुना अधिक फल मनुष्योंको सर्वदा
ऋतुमें आकाशवास (खुले आकाशके नीचे रहकर | [इस पुराणके श्रवणसे] मिल जाता है ॥ ६२-६३ ॥
वृष्टिका सहन) करता है, उसको मिलनेवाला फल | वैसे ही गोमतीनदीके संगममें जो मनुष्य भक्तिपूर्वक
गणेशपुराणके पाँच अध्यायोंको सुननेमात्रसे मिल जाता | स्नान करता है, उससे मिलनेवाले पुण्यफलसे कोटिगुना
है। जो मनुष्य भक्तिभावसे सर्वदा (यावज्जीवन) अग्निहोत्रका | अधिक फल इस पुराणका श्रवण करनेसे वह प्राप्त कर
अनुष्ठान करता है, उसे प्राप्त होनेवाला फल इस पुराणका | लेता है ॥ ६४ ॥
श्रवण करनेमात्रसे मिल जाता है ॥ ५५-५७ ॥ | जो भक्तिमान् मनुष्य इस गणेशपुराणका श्रवण
हे द्विजो ! जो मनुष्य दस हजार वर्षोंतक अपने | करता है, उसे न [भगवान् शंकरके] त्रिशूलसे, न
पैरके एक अंगूठेके सहारे खड़ा रहकर तपस्या करता है, | [देवराज इन्द्रके] वज्रसे और न चक्रधर भगवान्
उसको जैसा फल मिलता है, वैसा ही पुण्यफल इस | नारायणके सुदर्शन चक्रसे ही भय रह जाता है ॥ ६५ ॥
पुराणके दस अध्यायोंको भक्तिभावसे सुननेमात्रसे निश्चय | हे मुनीश्वरो ! मैंने आपलोगोंके समक्ष इस पुराणका
ही प्राप्त हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ५८ १/२ ॥ | विस्तारपूर्वक समग्र वर्णन किया है। इसके सम्पूर्ण
जो मनुष्य यावज्जीवन इस लोकमें नित्यप्रति | माहात्म्यको तो ब्रह्मा, कार्तिकेय अथवा शेषनाग भी
गणेशपुराणका श्रवण करता है, वह चक्रवर्ती सम्राट् होता | करोड़ों वर्षोंमें बतलानेमें समर्थ नहीं हो सकते ॥ ६६ ॥
है। जो मनुष्य जन्मसे लेकर मृत्युपर्यन्त काशीवास करता | आप लोगोंने जो पूछा है, वह सभी पापोंका
है, उसे [काशीवाससे] मिलनेवाला पुण्यफल गणेशपुराणके | नाशक, सभी अभीष्टोंको देनेवाला, भोग-मोक्षप्रद तथा
श्रवणसे प्राप्त हो जाता है ॥ ५९-६० १/२ ॥ | पुण्योंकी वृद्धि करनेवाला है। नानाविध लीलाएँ करनेवाले
जो मनुष्य एक हजार माघमासोंतक प्रयागमें | परमेश्वर गणपतिका यह पुराण वक्ता और श्रोताको
स्नान करता है, उससे मिलनेवाला जो पुण्यफल है, वही | निष्पाप बनानेवाला है। [इसे मैं आप लोगोंको सुना चुका
फल उसको गणेशपुराणका श्रवण करनेसे प्राप्त हो | हूँ], अब आप और क्या सुनना चाहते हैं? ॥ ६७-६८॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'फलश्रुतिनिरूपण' नामक एक सौ पचपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १५५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण क्रीडाखण्ड पूर्ण हुआ ॥
॥ गणेशपुराण सम्पूर्ण ॥