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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 621, कुल 656 में से

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पृष्ठ 621

क्री०ख०-अ०१४५ ] * श्रीगणेशजीका राजा वरेण्यको अपने विराट्स्वरूपका दर्शन कराना * ६१९
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अथवा कोई भी व्यक्ति हो, जो मेरी केवल पूजा ही | बहिर्मातृकान्यास तथा षडंगन्यास करे ॥ १४-१५ ॥
करता है अर्थात् अन्य साधन नहीं करता, वह भी | इसके उपरान्त मूलमन्त्रका न्यास करके ध्यान करे
सिद्धिको प्राप्त होता है। मुझे छोड़कर और मुझसे | और स्थिर चित्तसे गुरुमुखसे सुने हुए मन्त्रका जप करे।
[चित्र] | फिर देवताके निमित्त जपको निवेदनकर अनेक स्तोत्रोंसे
| स्तवन करे। इस प्रकारसे जो मेरी उपासना करता है, वह
| सनातनी मुक्तिको प्राप्त होता है ॥ १६-१७ ॥
| जो मनुष्य उपासनासे हीन है, उसे धिक्कार है और
| उसका जन्म वृथा है। यज्ञ, औषध, मन्त्र, अग्नि, आज्य,
| हवि और हुत—यह सब मेरा ही स्वरूप है ॥ १८ ॥
| ध्यान, ध्येय, स्तुति, स्तोत्र, नमस्कार, भक्ति, उपासना,
| वेदत्रयीसे जाननेयोग्य, पवित्र, पितामहका पितामह—
| सब मैं ही हूँ ॥ १९ ॥
| ओंकार, पावन, साक्षी, प्रभु, मित्र, गति, लय,
| उत्पत्ति, पोषक, बीज, शरण, इसी प्रकार असत्, सत्,
| मृत्यु, अमृत, आत्मा, ब्रह्म, दान, होम, तप, भक्ति, जप,
| स्वाध्याय—यह सब मैं ही हूँ ॥ २०-२१ ॥
| यह जो कुछ भी करे, वह सब मुझे निवेदन कर
द्वेषकर जो अन्य किसी देवताका भक्तिसे पूजन करता है। | दे। मेरा आश्रय ग्रहण करनेवाले स्त्री, दुराचारी, पापी,
हे राजन्! वह भी मेरी ही पूजा करता है, किंतु | क्षत्रिय-वैश्य-शूद्रादि भी मुक्त हो जाते हैं, फिर मेरे भक्त
विधिपूर्वक नहीं। जो अन्य देवताका अथवा मेरा पूजन | द्विजातिकी तो बात ही क्या है? मेरा भक्त मेरी इन
करके अन्यके प्रति द्वेष करता है, वह सहस्र कल्पवर्षतक | विभूतियोंको जानकर कभी नष्ट नहीं होता ॥ २२-२३ ॥
नरकमें पड़कर सदा दुःख भोगता है ॥ ११-१३ १/२ ॥ | मेरे प्रभव (उत्पत्ति) और मेरी विभूतियोंको देवता
[पूजनार्थ उद्यत साधक] सर्वप्रथम भूतशुद्धि करके | और ऋषि भी नहीं जानते। मैं अनेक विभूतियोंसे विश्वको
फिर प्राणायाम करे। फिर चित्तकी वृत्तियोंका निरोध | व्याप्त करके स्थित हूँ। जो-जो इस लोकमें श्रेष्ठतम हैं, वे
करके न्यास करे, पहले अन्तर्मातृकान्यास करके फिर | सब मेरी विभूति हैं—ऐसा समझो ॥ २४-२५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'उपासनायोगका वर्णन' नामक एक सौ चौवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४४ ॥
एक सौ पैंतालीसवाँ अध्याय
श्रीगणेशजीका राजा वरेण्यको अपने विराट्स्वरूपका दर्शन कराना
वरेण्य बोले—हे भगवन्! नारदजीके मुखसे | इस समय आप अपना मनोहर और व्यापक रूप मुझे
मैंने आपकी अनेक विभूतियोंका श्रवण किया है, | दिखाइये ॥ २ ॥
उन्होंने मुझसे कहा कि मैं उन (विभूतियोंमें कुछ)- | श्रीगणेशजी बोले—अकेले मुझमें ही तुम यह
को जानता हूँ, समस्त विभूतियोंको तो वे (गजानन) | चराचर संसार देखो और अनेक प्रकारके दिव्य आश्चर्य
ही जानते हैं ॥ १ ॥ | देखो, जो पूर्वकालमें किसीने नहीं देखे हैं ॥ ३ ॥
हे गजानन! आप ही उन सबको तत्त्वसे जानते हैं, | मैं अपने प्रभावसे तुमको ज्ञाननेत्र देता हूँ; क्योंकि