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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 619, कुल 656 में से

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पृष्ठ 619

क्री०ख०-अ०१४३ ] * श्रीगणेशजीका राजा वरेण्यको अपने तात्त्विक स्वरूपका परिचय देना * ६१७
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महाचंचल है। योगी सदा इस प्रकार करनेसे परम | कारण साधारण मनुष्य इसका छेदन करनेमें समर्थ नहीं
शान्तिको प्राप्त होता है और वह संसारमें अपनी | होते ॥ २०-२१ ॥
आत्माको और अपनी आत्मामें संसारको देखता है। योगसे | अतिशय दुःख, वैराग्य, भोगतृष्णाका त्याग, गुरुकी
जो मुझको प्राप्त होता है, उसको मैं आदरपूर्वक प्राप्त | कृपा, सत्संग-ये इस (मन)-को जीतनेके उपाय हैं।
होता हूँ और जो मुझे नहीं छोड़ता है, उसको मैं नहीं | योगसिद्धिके निमित्त अभ्याससे मनको अपने वशमें
छोड़ता हूँ तथा संसारसे मुक्त कर देता हूँ ॥ १४-१६ ॥ | करे, हे वरेण्य ! बिना मनको जीते योगसाधन महाकठिन
सुख-दुःख, द्वेष, क्षुधा, सन्तोष और तृषा-इनमें | है ॥ २२-२३ ॥
जो आत्माके समान सब प्राणियोंको देखता है, जो मुझ | वरेण्य बोले-हे भगवन्! योगभ्रष्टको किस
सर्वव्यापीको जानता है और जो केवल मुझमें संलग्न है, | लोककी प्राप्ति होती है, उसकी क्या गति होती है और
वह जीवन्मुक्त है और वह त्रिलोकीमें ब्रह्मादि देवताओंद्धारा | क्या फल होता है? हे सर्वज्ञ ! हे बुद्धिरूपी चक्रको
नमस्कार करनेयोग्य है ॥ १७-१८ ॥ | धारण करनेवाले ! मेरे इस सन्देहका छेदन कीजिये ॥ २४ ॥
वरेण्य बोले-हे भगवन् ! इन दोनों प्रकारके | श्रीगणेशजी बोले- [हे राजन् !] योगभ्रष्ट पुरुष
योगोंको मैं महाकठिन देखता हूँ, कारण कि मन बड़ा दुष्ट | दिव्य देह धारणकर स्वर्गमें जाते हैं, वहाँ उत्तम सुख भोगकर
और चंचल है तथा इसका निग्रह करना कठिन है ॥ १९ ॥ | पुनः शुद्ध आचरणवाले योगियोंके कुलमें जन्म लेते हैं।
श्रीगणेशजी बोले- [हे राजन्!] जो निग्रह | और फिर पूर्वजन्मोंके संस्कारसे वे योगी होते हैं। कोई भी
करनेमें कठिन इस मनका नियमन करता है, वह | पुण्यकर्म करनेवाला नरकको नहीं जाता ॥ २५-२६ ॥
घटीयन्त्रके समान घूमनेवाले इस संसारचक्रसे मुक्त हो | हे नराधिप ! योगनिष्ठ साधक ज्ञाननिष्ठ, तपोनिष्ठ
जाता है। विषयरूपी अरोंसे यह दृढ़ चक्र बना हुआ है | तथा कर्मनिष्ठ साधकोंसे श्रेष्ठ है और जो मेरा भक्त है,
और कर्मरूपी कीलोंसे अच्छी प्रकार जड़ा हुआ है, इस | वह तो इन सभीसे श्रेष्ठतम है ॥ २७ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'योगावृत्तिप्रशंसनयोग' नामक एक सौ बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४२ ॥
एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय
श्रीगणेशजीका राजा वरेण्यको अपने तात्त्विक स्वरूपका परिचय देना
श्रीगणेशजी बोले- [हे राजन् !] इस प्रकार | और भी वृद्ध मुनिजन ऐसा वर्णन करते हैं कि
मुझमें मन लगाकर मेरा वह तत्त्व जानो, जिसको जाननेसे | आने-जानेवाली, जीवत्वको प्राप्त हुई तथा त्रिलोकीमें
मुझे सर्वगत और यथार्थ जानकर मुक्त हो जाओगे ॥ १ ॥ | व्याप्त भी मेरी दूसरी (परा) प्रकृति है ॥ ५ ॥
हे राजन् ! लोगोंके ऊपर अनुग्रहकी इच्छासे वह | इन दोनोंसे ही समस्त चराचर जगत् उत्पन्न होता
तत्त्व मैं तुमसे वर्णन करता हूँ, जिसको जाननेसे दूसरे | है और इस जगत्की उत्पत्ति, पालन और नाशका कर्ता
मुक्तिके साधनको जाननेकी आवश्यकता नहीं रहती ॥ २ ॥ | मैं ही हूँ। मेरे इस तत्त्वको जाननेके निमित्त वर्णाश्रमी
प्रथम तो मेरी प्रकृतिको जानना चाहिये, उससे ज्ञान | पुरुषोंमें पूर्वजन्मके कर्मोंके अनुसार कोई एक यत्न करता
प्राप्त होता है, इसके उपरान्त मेरा ज्ञान होनेसे प्राणियोंको | है ॥ ६-७ ॥
विज्ञान-सम्पत्तिकी प्राप्ति होती है ॥ ३ ॥ | उन यत्नवानोंमें कोई एक मेरा साक्षात् करता है,
पृथ्वी, अग्नि, आकाश, अहंकार, जल, चित्त, | मुझसे अन्य और किसीको वह नहीं देखता और मुझमें
बुद्धि, वायु, रवि, चन्द्र, यजमान-यह ग्यारह प्रकारकी | सम्पूर्ण जगत्को देखता है ॥ ८ ॥
मेरी (अपरा) प्रकृति है ॥ ४ ॥ | पृथ्वीमें सुगन्धिरूपसे, अग्निमें तेजरूपसे, सूर्य और