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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 611, कुल 656 में से

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पृष्ठ 611

क्री०ख०-अ०१३८ ] * सूत-शौनक-संवादमें गणेशगीताका उपक्रम * ६०९

चित्तकी शुद्धि ही विज्ञानकी प्राप्तिमें प्रधान साधन
होती है, विज्ञानके द्वारा ही ऋषियोंने परब्रह्मको जाना है।
हे राजन्! इस कारण जो भी कर्म करे, वह बुद्धियुक्त
होकर करे। किसीकों स्वकर्म और स्वधर्मका त्याग नहीं
करना चाहिये ॥ ३७-३८ ॥
यदि कोई कर्मका त्याग करेगा तो उससे उसे
सिद्धिकी प्राप्ति नहीं होगी। ज्ञानमें प्रथम अधिकार भी
कर्मसे ही प्राप्त होता है। कर्मसे शुद्धहृदय होकर
(साधक) अभेदबुद्धिको प्राप्त होता है, उसीका नाम
योग है, जिससे प्राणी अमर हो जाता है ॥ ३९-४० ॥
हे राजन् ! मैं दूसरा उत्तम योग कहता हूँ, तुम उसे
सुनो। पशु, मित्र, पुत्र, शत्रु, बन्धु तथा प्रियजनमें समान
दृष्टि करनी चाहिये, बाहर-भीतर एक-सी दृष्टि रखते
हुए, सुख-दुःख, क्रोध, हर्ष, भय—इनमें समान रहना
चाहिये ॥ ४१-४२ ॥
रोगकी प्राप्ति हो, चाहे भोगकी प्राप्ति हो, जय हो
या पराजय हो, लक्ष्मीकी प्राप्ति हो या अप्राप्ति हो,
हानि-लाभ, जन्म-मरण—इन सबमें मनको समान रखना
उचित है ॥ ४३ ॥
सम्पूर्ण वस्तुओंमें समान भावसे बाहर-भीतर मुझे
स्थित जानते हुए, सूर्य, चन्द्रमा, जल, अग्नि, शिव,
शक्ति, वायु, ब्राह्मण, सरोवर, पापहारी महानदी, तीर्थ,
क्षेत्र, विष्णु, सम्पूर्ण देवता, यक्ष, उरग, गन्धर्व, मनुष्य
और पक्षी—इन सबमें जो मुझे सदा समान दृष्टिसे देखता
है, वही योगको जाननेवाला कहलाता है ॥ ४४-४६॥
हे राजन् ! जो ज्ञानद्वारा इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाकर
सर्वत्र समान बुद्धि रखता है, वही मेरी दृष्टिमें योगी है।
अपने धर्ममें आसक्त चित्तवाले प्राणीकी दैवयोगसे जो
आत्मा और अनात्माके विचारकी बुद्धि उत्पन्न होती है,
उस बुद्धिके योगका ही नाम योग है और उसी बुद्धिके
न होनेसे यह प्राणी धर्म-अधर्मका त्याग कर देता है, इस
कारण योगमें बुद्धि लगाना उचित है, कर्तव्य कर्मोंमें
कुशलता ही योग है ॥ ४७-४९ ॥
जितेन्द्रिय और बुद्धिमान् व्यक्ति धर्म और अधर्मके
फलका त्याग करके जन्म-बन्धनसे मुक्त होकर अनामय
परमपदको प्राप्त होता है ॥ ५० ॥
जब इस प्राणीकी बुद्धि अज्ञानरूप अन्धकारसे—
अविद्यासे रहित होगी, तब क्रमसे इस प्राणीका सकाम
वेदवाक्यादिकोंमें वैराग्य हो जाता है। जब तीनों वेदोंमें
प्रतिपादित किये गये सकाम कर्मोंसे विरत हुई बुद्धि
पूर्णतः और परमात्मामें लगकर निश्चल हो जाती है, तब
प्राणीको योगकी प्राप्ति होती है ॥ ५१-५२ ॥
हे प्रिय! जब यह बुद्धिमान् व्यक्ति मनकी सम्पूर्ण
इच्छाओंका त्याग कर दे और अपने आत्मामें आपहीसे
सन्तुष्ट हो जाय, तब यह स्थिरबुद्धि कहलाता है ॥ ५३ ॥
किसी प्रकारके भी संसारी सुखोंमें तृष्णा न
रखनेवाला, दुःखमें अनुद्विग्न, भय, क्रोध और रागसे
रहित व्यक्ति ही स्थिरबुद्धि कहा गया है ॥ ५४ ॥
जिस प्रकारसे कछुआ सब ओरसे अपने अंगोंको
सिकोड़ लेता है, इसी प्रकारसे योगीको उचित है कि वह
विषयोंसे इन्द्रियोंको समेट ले ॥ ५५ ॥
भोजन त्यागनेवाले साधकके विषय तो नष्ट हो
जाते हैं, परंतु उनका अनुभव बना रहता है। ब्रह्मकी
प्राप्ति होनेसे वह राग भी नष्ट हो जाता है ॥ ५६ ॥
हे राजन् ! इन्द्रियाँ मोक्षके लिये प्रयत्न करनेवाले
विद्वान् पुरुषका भी मन बलात् हर लेती हैं। इस कारण
बुद्धिमान् पुरुषको इन्द्रियोंको वशमें करनेका यत्न करना
चाहिये। इन्द्रियोंको वशमें करके योगीको सदा मेरे
परायण होना चाहिये। जिसकी इन्द्रियाँ वशमें हो गयी
हैं, उसीको स्थितप्रज्ञ कहते हैं ॥ ५७-५८ ॥
विषयोंका चिन्तन करनेवाले पुरुषको उनमें अनुराग
हो जाता है, आसक्ति (अनुराग)-से कामना होती है
और उससे क्रोधकी उत्पत्ति होती है ॥ ५९ ॥
क्रोधसे अज्ञानकी उत्पत्ति और इससे स्मृतिभ्रंश
होता है, स्मृतिभ्रंशसे बुद्धि नष्ट होती है और बुद्धि नष्ट
होनेसे वह प्राणी भी नष्ट हो जाता है ॥ ६० ॥
अनुराग और द्वेषसे रहित अपने वशमें आयी
इन्द्रियोंसे विषयोंका भोग करके भी चित्तको अपने वशमें
रखनेवाले महापुरुष सन्तोष और शान्तिको प्राप्त होते हैं।
सन्तोषकी प्राप्ति होनेसे तीनों प्रकारके दुःख नष्ट हो