श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 60, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें५८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
[बायाँ स्तम्भ]
पिता और भाईका कोई विचार नहीं होता, जैसे कि
कामातुरको भय और लज्जा नहीं होती ॥ ४-६ ॥
क्या तुमने कौएको शुद्धिका विचार करते हुए,
जुआ खेलनेवालेको सत्य बोलते हुए, नपुंसकको धैर्य
रखते हुए, स्त्रियोंमें निष्कामता और सर्पोंमें क्षमाके
भावको देखा है ? ॥ ७ ॥
विधाताने दैवयोगसे तुम्हें मुझ आजीविकारहितके
पास भेज दिया है, मैं तुम्हें कदापि नहीं छोड़ सकता ॥ ८ ॥
भृगुजी बोले—ऐसा कहकर तुमने अपने दाहिने
हाथमें तीक्ष्ण धारवाला खड्ग लेकर उस (ब्राह्मण)-का
सिर उसी प्रकारसे काट दिया, जिस प्रकार बिलाव
मूषकका ॥ ९ ॥
इस प्रकार तुम्हारे द्वारा की गयी ब्रह्महत्याओंकी
गणना करना सम्भव नहीं है, उसमें भी विशेष रूपसे
स्त्रियों, बालकों, वृद्धजनों और जीव-जन्तुओंकी हत्याओंकी
गणना नहीं हो सकती [और गणना करनी भी नहीं
चाहिये]; क्योंकि दूसरेके पापोंकी गणना करनेवाला भी
उसमें विशेष रूपसे भागीदार हो जाता है ॥ १०१/२॥
हे कामन्द ! तदनन्तर बहुत समय बीतनेपर तुम्हारी
वृद्धावस्था आ गयी। तुम्हें कफ, अवसाद, पसीना
हिचकी और कँपकँपी होने लगी। तुम्हें बैठनेपर तो नींद
आ जाती, परंतु लेटनेपर वह नहीं आती ॥ ११-१२ ॥
तुम्हारे पुत्र, सेवक-सेविकाएँ, मित्रगण, पुत्रियाँ
और दौहित्र—सभी तुम्हारा अनादर करते थे ॥ १३ ॥
वहाँ तुम्हारे पास एक विश्वसनीय ब्राह्मण था,
जो गोपनीय ढंगसे तुम्हारे कार्य करता था, वह तुम्हारा
देखा-समझा था तथा घरमें बेरोकटोक आने-जानेमें
समर्थ था, उसे तुमने सभी वनवासी मुनियोंको बुला
लानेके लिये भेजा, तब तुम्हारे भयसे और उस ब्राह्मणके
वचनका आदर करते हुए वे सब तुम्हारे पास
आये ॥ १४-१५ ॥
तब तुमने उन [मुनियों]-को प्रणाम करके कहा—
'[आप लोग] मुझसे दान ग्रहण करें।' तब उन लोगोंने
कहा—'हम तुझ पतितसे दान नहीं ग्रहण करेंगे' ॥ १६ ॥
पापी व्यक्तिका यज्ञ कराने, उसे वेदाध्ययन कराने,
[दायाँ स्तम्भ]
उससे विवाहादि सम्बन्ध रखने, बातचीत करने, उसके
साथ एक वाहनपर बैठने और साथ भोजन करनेसे
उसका पाप दूसरेमें भी संचरित हो जाता है—ऐसा तुमसे
कहकर वे लोग अपने-अपने आश्रमोंको चले गये और
वहाँ जाकर उन सबने पावमानी ऋचाका जप करते हुए
सचैल (वस्त्रसहित)-स्नान किया ॥ १७-१८॥
हे कामन्द (राजा सोमकान्तके पूर्वजन्मका नाम) !
तब रोग-पीड़ित होने, स्वजनोंद्वारा त्याग दिये जाने और
ब्राह्मणोंद्वारा भी बहिष्कृत कर दिये जानेसे तुम्हारे मनमें
अत्यधिक अनुताप (पापकर्मके बाद पछतावा) उत्पन्न
हुआ ॥ १९ ॥
स्वर्ण-रजत एवं रत्नादिसे समन्वित अपनी विपुल
सम्पत्ति देखकर तुम्हारी बुद्धिमें किसी देवालयके
जीर्णोद्धारसम्बन्धी विचार प्रस्फुटित हुआ ॥ २० ॥
तब ब्राह्मणोंने तुमसे कहा कि वनमें एक छोटा-
सा टूटा-फूटा देवमन्दिर है, उसमें गणेशजीकी श्रेष्ठ,
अनादि और मंगलमयी मूर्ति स्थित है ॥ २१ ॥
तदनन्तर तुमने अत्यधिक विस्तार और ऊँचाईवाले,
चार तोरणोंसे युक्त चार द्वारवाले, अत्यन्त सुन्दर चार
शिखरोंसे शोभायमान, अनेक स्तम्भों और अनेक वेदियोंसे
समन्वित, मोती-मूँगा-रत्नों आदिसे जड़ित सुन्दर आँगनवाले,
अनेक प्रकारके पुष्पोंके वृक्षों और अनेक प्रकारके
फलोंके वृक्षोंसे समन्वित, चारों दिशाओंमें निर्मल जलसे
पूर्ण वापियोंसे सुशोभित मन्दिरका निर्माण करवाया;
जिसमें तुम्हारा [अधिकांश] धन व्यय हो गया और
कुछ धन स्त्री, पुत्रों, मित्रों और बान्धवोंद्वारा हरण कर
लिया गया ॥ २२-२५ ॥
तदनन्तर थोड़े ही समय बाद तुम पंचतत्त्वोंमें
विलीन हो गये। यमराजके दूतोंने तुम्हें बाँधकर कोड़ोंका
प्रहार करते हुए बहुत ताड़ित किया ॥ २६ ॥
तुम्हारा सारा शरीर काँटोंसे बिंध गया, तुम्हें
पत्थरपर पटका गया और मवाद तथा रक्तके कीचड़वाले
भयंकर नरकमें तुम्हें डुबोया गया ॥ २७ ॥
इस प्रकार तुम उन दूतोंद्वारा चित्रगुप्त और यमराजके
पास ले जाये गये। तब यमराजने पूछा—पुण्य और पापमें