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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 481, कुल 656 में से

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पृष्ठ 481

क्री०ख०-अ०८९ ] * दसवें तथा ग्यारहवें मासकी अवस्थामें गुणेशद्वारा दैत्योंके वधकी कथा * ४७९
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फल देकर वह बालक गणेशसे बोला—खाओ- | तरहसे टूट गया। इधर बालक गुणेशने भी उसी क्षण
खाओ, इस फलको शीघ्र ही खाओ। मैं इस फलको | बलपूर्वक उसके सिरको खींचा, जिसके कारण कण्ठनालसे
बहुत दूरसे लाया हूँ, यह फल जन्म, मृत्यु और | पृथक् होकर उसका सिर बालक गुणेशके हाथमें आ
वृद्धावस्थाका हरण करनेवाला है॥ ३३॥ | गया। उसी क्षण सारी भूमि रक्तसे सन गयी। उस दैत्यके
बालक गुणेशने उसके दुष्ट मनोभावको जानते हुए | सिरको कमलकी भाँति हाथमें लेकर गिरिजापुत्र गुणेश
वह फल ले लिया और उसे खा भी लिया, पुनः उन्होंने | उससे खेलने लगे॥ ३९-४१॥
निडर होकर दूसरा फल भी उस दैत्यसे माँगा ॥ ३४॥ | बालक गुणेशके सभी अंग भी रक्तसे लथपथ हो
ब्रह्माजी बोले- भगवान् शिवकी इच्छासे अमृत | गये, यह देखकर गणोंने माता पार्वतीको यह समाचार
भी विष हो जाता है और विष भी अमृत हो जाता है। | सुनाया। वहाँ जाकर उन्होंने पुत्रको देखा और पुत्रकी
तदनन्तर वे गुणेश उसके वक्षःस्थलको पकड़कर उसी | वैसी स्थिति देखकर उन्होंने बालकके हाथसे उस दैत्यके
क्षण उठ खड़े हुए। उन्होंने उसके दोनों घुटनोंपर अपने | सिरको दूर फेंक दिया और वस्त्रसे बालकको पोंछा। फिर
पैर रख दिये और दोनों हाथोंसे उसकी चोटीको पकड़ | उसे स्नान कराया, स्वयं भी स्नान किया और प्रसन्नतापूर्वक
लिया। फिर उन्होंने अपने हाथोंसे उसकी दाढ़ी पकड़कर | बालक गुणेशको स्तनपान कराया॥ ४२-४३॥
लीलापूर्वक उसे झुला डाला ॥ ३५-३६॥ | तदनन्तर उनकी सखियाँ तथा गण वहाँ आये और
फिर वे पृथ्वीके समस्त भारको धारणकर उसके | उन्होंने बालककी कुशल पूछी। वे बोलीं शिवभक्तिके
जानु-भागमें खड़े होकर नाचने लगे। पीड़ित होकर वह | कारण यह बालक अत्यन्त कुशलसे है॥ ४४॥
दैत्य कहने लगा-मेरे जानुदेशसे नीचे उतरो ॥ ३७॥ | महर्षि मरीचिद्वारा किये गये रक्षाविधानके कारण
तुम्हारे बोझसे तथा तुम्हारे द्वारा नाच करनेसे मेरे | भी मेरा बालक कुशलसे है। तदनन्तर उन गणोंने उस
शरीरमें अत्यन्त पीड़ा हो रही है, अरे गिरिजाके पुत्र ! | दुष्ट दानवको ले जाकर दूर फेंक दिया ॥ ४५ ॥
मुझे छोड़ दो-छोड़ दो, मैं अपने घरको चला जाऊँगा ॥ ३८॥ | तब अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर सभी गण तथा
ब्रह्माजी बोले- उस दैत्यके द्वारा इस प्रकार | सखियाँ अपने-अपने घरोंको गये। पार्वती भी अत्यन्त
प्रार्थना किये जानेपर भी बालक गुणेशने उसे नहीं छोड़ा। | हर्षयुक्त होकर बालक गुणेशको लेकर अपने भवनमें
तब वह दैत्य जोर लगाकर उठा तो उसका शरीर पूरी | प्रविष्ट हुईं ॥ ४६ ॥
॥ इस प्रकार गणेशपुराणके अन्तर्गत क्रीडाखण्डमें 'मंचकासुरका वध' नामक अठासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८८ ॥
नवासीवाँ अध्याय
दसवें मास तथा ग्यारहवें मासकी अवस्थामें बालक गुणेशद्वारा किये गये आजगरासुर तथा
शलभासुर नामक दैत्योंके वधकी कथा
ब्रह्माजी बोले— [हे व्यासजी !] जब बालक | बोल भी रहे थे। कभी वे लुढ़क जाते थे। कभी नाचने
गुणेशका दसवाँ मास चल रहा था। उस समय एक | लगते थे, तो कभी माता पार्वतीको देखकर रोने लगते
दिनकी बात है, जब भगवान् सूर्यका उदय होनेके बाद | और उनके पीछे लग जाते और कभी सहसा भगवान्
तीन मुहूर्तका समय व्यतीत हो गया था। तब पार्वतीपुत्र | शिवके पीछे चलने लगते। इस प्रकारकी आनन्ददायिनी
गुणेश कभी पेटके बल रेंगते हुए और कभी पैरोंसे चलते | क्रीडा करते हुए अपने बालकको देखकर उस समय
हुए क्रीडा कर रहे थे और कुछ-कुछ अस्पष्ट वाणीमें | पार्वती अत्यन्त हर्षित हो उठीं ॥ १-३॥