श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 338, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३३६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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ब्रह्माजी बोले— हे मुने ! पुत्रप्राप्तिके लिये दुर्धर्षने | कर दिया। उन दोनों अमात्योंने उसे नीतिकी शिक्षा दी,
बहुत प्रकारके प्रयत्न किये, किंतु दुर्दैवके कारण उन्हें कोई | किंतु उसने उनके वचनोंको नहीं माना ॥ २६-२७ ॥
भी पुत्र प्राप्त नहीं हुआ। एक धीवरमें आसक्त मनवाली | उन दोनों दयालु अमात्योंने बार-बार उसे समझाया
उसकी पत्नी प्रमदाने शुभ मुहूर्तमें पुत्रको उत्पन्न किया, किंतु | तो उसने रुष्ट होकर उन दोनोंको जंजीरसे बाँध दिया।
कोई जान नहीं सका कि वह जारज पुत्र है ॥ २१-२२ ॥ | माता-पिताने उस हृदयहीन पुत्रको समझाते हुए कहा—
उन दोनों अमात्योंने जितने भी राजचिह्न थे, सभी | अरे दुष्ट ! जिनके कृपाप्रसादसे तुमने निष्कंटक राज्य प्राप्त
उस साम्ब नामक पुत्रको प्रदान किये। राजकोषसहित | किया, उन दोनों सज्जन अमात्योंको तुमने बन्धनमें डाल
सम्पूर्ण राष्ट्र और सारा राज्य उसे प्रदान कर दिया ॥ २३ ॥ | दिया? किंतु उस दुष्टने माता-पिताके भी अमृतमय
वे दोनों अमात्य जिस प्रकार पहले स्थित थे, उसी | वचनोंका उल्लंघन करके उन दोनोंको बन्धनमें डालकर
प्रकार अमात्य पदपर प्रतिष्ठित हुए। राज्य प्राप्तकर | उन्हें भी कारागारमें डाल दिया ॥ २८—२९१/२ ॥
दुर्धर्षका पुत्र वह साम्ब राजलक्ष्मीके कारण उन्मत्त हो | उसका दुष्टबुद्धि नामक अत्यन्त दुष्ट मित्र निरन्तर
गया। स्त्री, मांस तथा मदिरामें आसक्त वह साम्ब | उसके साथ रहता था। साम्बने उसीको अपना सचिव
हाथीकी भाँति आलसी हो गया। वह प्रतिदिन दुराचरणमें | बनाया और उसे अश्व, सुवर्ण, घोड़े, विविध रत्न, दिव्य
परायण रहने लगा और नीतिके मार्गसे पराङ्मुख हो | वस्त्र, रंकु जातिके हिरणोंके बालोंसे बने ओढ़नेके वस्त्र,
गया ॥ २४-२५ ॥ | असंख्य दासी-दास, वाहन, ग्राम, नारिक आदि खाद्य
उसने धनिकोंका सारा धन लेकर उन्हें राज्यसे | प्रदान किया और यह भी घोषणा करवायी कि जो
बाहर निकाल दिया और वह ब्राह्मणों तथा सत्पुरुषोंका | इसकी आज्ञाका पालन नहीं करेगा, उसका सिर बलपूर्वक
अपमान करने लगा। उसने उनकी वंश-परम्परासे चली | काट दूँगा। सभी लोगोंसे ऐसा कहकर साम्ब अन्तःपुरमें
आ रही आजीविकाका हरणकर उन्हें राज्यसे बाहर निर्वासित | चला गया ॥ ३०—३३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'अमात्यनिग्रह' नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २७ ॥
अट्ठाईसवाँ अध्याय
राजा साम्ब तथा दुष्टबुद्धिके जन्म-जन्मान्तरोंकी कथा, उनके द्वारा अनजानमें
किये गये शमीपत्रके पूजनसे गजाननका प्रसन्न होकर उन्हें दिव्य
देह प्राप्त कराकर स्वर्गलोक प्राप्त कराना
ब्रह्माजी बोले— राजा साम्बका वह दुष्टबुद्धि | जो भी यौवनवती स्त्री उसके दृष्टिपथमें आती थी,
नामक अमात्य राज्यका कार्य करता था और स्वयं साम्ब | वह कामी साम्ब उसके साथ विषयोपभोगमें निरत हो
केवल सुन्दर स्त्रियोंका संग करता था। वह राज्यमें जिस | जाता था। वह पराये धन तथा परायी स्त्रीको बलपूर्वक
स्त्रीके विषयमें सुनता था कि वह सुन्दर है, चाहे वह | ग्रहण कर लेता था। उसका वह मन्त्री दुष्टबुद्धि भी
विवाहित हो या अविवाहित हो, सधवा हो अथवा | उसीके समान दुर्गुणोंवाला तथा कुमार्गमें परायण रहनेवाला
विधवा हो, वह उसके परिजनोंके रोने-चिल्लानेपर भी | था ॥ ३-४ ॥
दुराचार करनेके लिये बलात् उसका अपहरण कर लेता | इस प्रकार दुराचारपरायण वे दोनों निर्दयी कन्या,
था। वह विषयलम्पट जातिभेदका भी विचार नहीं करता | माता तथा बहिनका भी परित्याग नहीं करते थे ॥ ५ ॥
था॥ १-२॥ | वे दोनों न तो ब्रह्महत्या, न स्त्रीहत्या और न