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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 318, कुल 656 में से

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पृष्ठ 318

३१६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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वे दूरसे दौड़ते हुए आकर छलाँग लगाते हुए | सकता है', इसपर राजा बोले कि 'निश्चित ही जो कोई
जलमें कूदने लगे, वहाँपर इस प्रकारके खेल खेलकर वे | जो कुछ भी माँगेगा, उसे वह अवश्य ही दिया जायगा,
सभी बालक अपने-अपने घर जानेके लिये तैयार | इतना ही नहीं मैं अपना जीवन भी दे दूँगा ॥ २४-२५ ॥
हुए ॥ १४ ॥ | आप लोग इस बालकको पूरा बल लगाकर
उसी समय बालक विनायकने जलके अन्दर अपनी | वेगपूर्वक बाहर निकालिये।' राजाके द्वारा कहे गये इस
परछायीं देखी। वे तैरना जानते हुए भी जलमें तैरते हुए | प्रकारके वचनोंको सुनकर तीन व्यक्ति कुएँके अन्दर
सभी बालकोंको देखते हुए बाहर ही खड़े रहे। इसी | प्रविष्ट हो गये। वे तीनों दैत्यद्वारा की गयी मायाके
बीच दुष्ट असुर कन्दरने उन्हें जलके अन्दर ढकेल | प्रभावसे जलमें डूब गये। यह देखकर अन्य किसीने उस
दिया। उस जलको अगाध जानकर वे लीलापूर्वक | कुएँमें जानेका मन नहीं बनाया। तब राजा बालक
जलका आलोडन करने लगे। वे आधे मुहूर्ततक जलके | विनायकके लिये शोक करने लगे ॥ २६-२७ ॥
अन्दर रहते और फिर आधे मुहूर्ततक जलके बाहर | राजा बोले—मैंने ऐसा कौन-सा दुष्कर्म किया
रहते ॥ १५-१७ ॥ | था, जिससे कि मुझे इस प्रकारका दुःख भोगना पड़ रहा
तदनन्तर वे जलमें डूबनेकी लीला करने लगे और | है। इस बालकको मैं अपने सुखके लिये क्यों लाया, यह
एक सामान्य शिशुकी भाँति डूबनेसे बचनेके लिये पैरों | तो दुःखदायी हो गया है ॥ २८ ॥
तथा करकमलोंको बार-बार इधर-उधर फेंकने लगे ॥ १८ ॥ | मैं उसके माता-पिताको तथा लोगोंको अब अपना
यह देखकर सभी बालक इधर-उधर भाग-दौड़ | मुख कैसे दिखलाऊँगा, इस (कलंक)-का परिमार्जन
करने लगे। तभी बालक विनायकने उस असुर कन्दरके | कैसे हो सकता है? इस बालकने तो अभीतकके आये
पैरोंको दृढ़तापूर्वक पकड़ लिया और वे प्रयत्नपूर्वक उसे | हुए अतिप्रबल अरिष्टोंको दूर कर दिया था, फिर आज
उस कुएँके अन्दरतक खींच ले गये। बालक विनायकने | यह किस प्रकार इस अरिष्टके वशीभूत हो गया !
उस असुर कन्दरको बलपूर्वक पानीके अन्दर डुबोया तो | विधाताकी चेष्टाको जाना नहीं जा सकता ॥ २९-३० ॥
वह 'छोड़ो-छोड़ो' ऐसा कहने लगा। विनायकने भी | सभी स्त्री, बाल, वृद्ध जब इस प्रकार शोक कर
उससे कहा- 'तुम भी मुझे छोड़ो-छोड़ो' ॥ १९-२० ॥ | ही रहे थे कि उसी बीच कुएँके अन्दर स्थित मेढकका
वे दोनों समान बलवाले थे, कभी डूबते थे तो कभी | रूप धारण किया हुआ वह दैत्य अपना मुख खोलकर
ऊपर आ जाते थे। हिरण्यकशिपु तथा भगवान् लक्ष्मीनृसिंहके | वहीं स्थित हो गया। उसी समय जब वे बालक विनायक
समान ही दोनों अपराजेय थे। बहुत समयतक असुर तथा | ऊपर आये तो दैत्य कन्दरने उन्हें धक्का देकर फिर कुएँमें
बालक विनायक दोनों उस कुएँके अन्दर ही रह गये तो | गिरा दिया, बालक विनायकने भी कन्दरको धक्का देकर
यह देखकर सभी बालक आर्त स्वरमें रोने लगे और | कुएँमें गिरा दिया, वह दुष्ट कन्दर सीधे जाकर उस कूप
कहने लगे कि बालक विनायककी मृत्यु हो गयी है। उस | नामक दैत्यके मुखके अन्दर गिरा ॥ ३१-३२ ॥
प्रकारके अपशकुनके शब्दको सुनकर नगरकी स्त्रियाँ, वृद्ध | कूप नामक दैत्यने उस कन्दरको उसी प्रकार निगल
तथा बालक वहाँ आ पहुँचे। काशिराज भी विलाप करने | लिया, जैसे एक बड़ा मत्स्य छोटे मत्स्यको निगल जाता
लगे और बोले- 'अब क्या किया जाय?' ॥ २१-२३ ॥ | है। मैंने बालक विनायकको निगल लिया है, ऐसा
कोई कहने लगा- 'अगाध जलवाले कुएँमें वह | समझकर उस कुएँका रूप धारण किये कूप नामक
बालक विनायक जीवित कैसे रहेगा? दूसरा कहने लगा | असुरने अपना वास्तविक रूप प्रकट कर लिया ॥ ३३ ॥
कि यदि इसे शीघ्र ही जलसे बाहर निकाल लिया जाय | तदनन्तर वह कूप नामक असुर अपने यशसे अर्जित
तो, इसके बचनेका निश्चित ही कोई उपाय किया जा | गगनचुम्बी आत्मप्रशंसाका स्वयं गान करने लगा कि