सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 296, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 296

२९४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
हे एकराट् गणेशजी ! मैंने आपके उदरदेशमें प्रत्येक | एवं हर्षसे समन्वित इन्द्रने सभी लोगोंके देखते हुए उन
रोममें व्याप्त ब्रह्माण्डोंमेंसे पृथक्-पृथक् विभक्त एक- | गणेशजीको दण्डवत् प्रणाम किया ॥ ३५ ॥
एक ब्रह्माण्डमें चौदह भुवनोंको प्रतिष्ठित देखा है ॥ २८ ॥ | देवराज इन्द्र सभी देवताओंके सुनते हुए लीलाके
मैंने अत्यन्त विस्तारवाले आपके समष्टि-स्वरूपों | लिये मनुष्यरूप धारण करनेवाले और महर्षि कश्यपके
एवं व्यष्टि-स्वरूपोंके साथ ही आपके सौम्य तथा | घरमें उत्पन्न उन ब्रह्मचारी गणेशकी स्तुति करने लगे ॥ ३६ ॥
भयंकर स्वरूपोंका दर्शन किया है ॥ २९ ॥ | इन्द्र बोले—आप अनन्त शक्तिसे सम्पन्न हैं,
मैंने आपके असंख्य एवं अद्भुत मुखों तथा | परमेश्वर हैं, विश्वात्मा हैं, विश्वके कारणरूप हैं, गुणोंके
नयनोंका दर्शन किया है और जगत्‌को क्षुब्ध कर | स्वामी हैं, विश्वको प्रकाशित करनेवाले हैं, समस्त
डालनेवाले आपके दुर्दर्श रूपोंको भी देखा है ॥ ३० ॥ | जगत्‌के लिये वन्दनीय हैं, भूत-भविष्य तथा वर्तमान—
दैत्यों, दानवों, देवताओं, मनुष्यों, यक्षों, राक्षसों, | तीनों कालोंमें विद्यमान रहनेवाले हैं; ब्रह्मा, विष्णु तथा
पिशाचों तथा अण्डज, स्वेदज, जरायुज और उद्भिज्ज— | शिवके रूपमें त्रिधा विभक्त हैं और सृष्टि, पालन तथा
इस प्रकारके चतुर्विध जीवोंसे परिपूर्ण आपके विराट् | प्रलय करनेवाले हैं, मैं आपको नहीं जानता ॥ ३७॥
स्वरूपोंका मैंने दर्शन किया है ॥ ३१ ॥ | आप अद्वितीय, शाश्वत, सच्चिदानन्दस्वरूप,
हे जगत्स्रष्टा ! आप अपने इस विकराल महान् | सर्वाध्यक्ष, कारणातीत, ईश्वर, चराचर जीवोंके प्रयत्नके
रूपको छिपा लें। हे निखिलेश्वर ! मैं तो मोहमें पड़ा था, | कारणभूत, कामनाओंको परिपूर्ण करनेवाले तथा सर्वत्र
किंतु आपके कृपाप्रसादसे [मेरा अज्ञान दूर हो गया है | व्याप्त रहनेवाले हैं, मैं आपको प्रणाम करता हूँ॥ ३८ ॥
तथा] मेरी स्मृति जाग्रत् हो गयी है ॥ ३२ ॥ | आप सभीके स्वामी हैं, सभी प्रकारकी विद्याओंके
हे विभो! मैं शरीर, मन तथा वाणीसे आपकी | निधान हैं, सबके आत्मरूप हैं, सबको ज्ञान प्रदान
शरणमें आया हूँ। हे भक्तवत्सल! आप अपना सौम्य | करनेवाले हैं, सबसे परे हैं, मन-वाणीसे न जाननेयोग्य
स्वरूप दिखलाइये१ ॥ ३३ ॥ | हैं, सभीके अधिष्ठान तथा सब कुछ जाननेवाले हैं, मैं
ब्रह्माजी बोले—इन्द्र इस प्रकार प्रार्थना कर ही | आपकी स्तुति करता हूँ२ ॥ ३९ ॥
रहे थे कि उन्होंने स्वयंको सभाके मध्यमें विद्यमान तथा | ब्रह्माजी बोले—इस प्रकार स्तुति करके, प्रणाम
उन गणेशजीको ब्रह्मचारीके रूपमें स्थित देखा ॥ ३४ ॥ | करके और उनकी पूजा करनेके अनन्तर इन्द्रने उन्हें
अत्यन्त आश्चर्यचकित मनवाले होकर तथा लज्जा | अपना अंकुश, कल्पवृक्ष तथा दो सेविकाएँ प्रदान कीं
१-शक्र उवाच
भूभारहरणार्थं यो जातः कश्यपनन्दनः। अचिन्त्यो महिमा यस्य किमु वर्ण्यो भवेन्मम ॥
निर्गमं देहि देवेश कुक्षेरत्यन्तविस्तरात् । अदृष्टपाराद्वर्षाणि द्वादश भ्रमता मया ॥
तव कुक्षौ मयादर्शि भुवनानि चतुर्दश । स्थाने स्थाने विभक्तानि प्रतिरोमाङ्गमेकराट् ॥
समष्टिव्यष्टिरूपाणि महाविस्तारवन्ति च। दृष्टानि तव रूपाणि ससौम्यानीतराणि च ॥
अद्भुतान्यप्यसंख्यानि वक्त्राणि नयनानि च। दृष्ट्वा दुर्दर्शरूपाणि जगत्क्षोभकराणि ते ॥
दैत्यदानवपूर्णानि सुरमानववन्ति च। यक्षरक्षःपिशाचादिचतुराकरवन्ति च ॥
विकराल महारूपमुपसंहर विश्वकृत् । गतो मोहं स्मृतिर्लब्धा प्रसादान्निखिलेश्वर ॥
कायेन मनसा बुद्ध्या वाचा त्वां शरणं गतः । प्राकृतं दर्शय विभो रूपं ते भक्तवत्सल ॥
(श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ११। २६–३३)
२-शक्र उवाच
जाने न त्वानन्तशक्तिं परेशं विश्वात्मानं विश्वबीजं गुणेशम्। विश्वाभासं विश्ववन्द्यं त्रिसत्यं त्रेधाभूतं जन्मरक्षार्तिहेतुम् ॥
एकं नित्यं सच्चिदानन्दरूपं सर्वाध्यक्षं कारणातीतमिशम्। चेष्टाहेतुं स्थावरे जङ्गमे च वाञ्छापूरं सर्वगं त्वाभिवन्दे ॥
सर्वेशानं सर्वविद्यानिधानं सर्वात्मानं सर्वबोधावभासम्। सर्वातीतं वाङ्मनोगोचरं त्वां सर्वावासं सर्वविज्ञानमीडे ॥
(श्रीगणेशपुराण, क्रीडाखण्ड ११ । ३७–३९)