श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 232, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें२३० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
पापोंका उसी प्रकार विनाश हो जायगा, जिस प्रकार | विनष्ट हो जानेपर वह सभी दिशाओं तथा देशोंको
कि भगवान् सूर्यके उदय हो जानेपर सम्पूर्ण अन्धकार | प्रकाशित करते हुए विमानमें आरूढ़ हो गया ॥ ७० ॥
विनष्ट हो जाता है। नाम-जपके अतिरिक्त किसी | तदनन्तर विघ्नराज गणेशजीकी आज्ञा पाकर उनके
अन्य उपायमें इसका अधिकार नहीं है, अतः [यह] | दूतोंने सभी लोगोंसे समन्वित उस विमानको क्षणभरमें ही
नामका ही जप [तथा श्रवण] करे ॥ ६६-६७ ॥ | गणेशजीके धाममें पहुँचा दिया ॥ ७१ ॥
ब्रह्माजी बोले-देवदूतोंके कथनानुसार राजा शूरसेनने | हे निष्पाप ! जो-जो आपने पूछा, वह सब मैंने बता
'जय' शब्दका उच्चारण करते हुए उस कुष्ठी वैश्यके | दिया है। यह श्रेष्ठ संकटचतुर्थीव्रत अत्यन्त पुण्यप्रद,
कानमें गणेशजीका जो चार अक्षरवाला नाम (गजानन) | धर्मकी प्राप्ति करानेवाला और यश तथा आयुष्यको
है, उसका तीन बार जप किया ॥ ६८ ॥ | प्रदान करनेवाला है। इसके माहात्म्यका श्रवण सभी
'गजानन' इस नाममन्त्रको सुनते ही वह कुष्ठी | प्रकारकी सिद्धियाँ प्राप्त करानेवाला है। यह व्रत सभी
दिव्य देहवाला हो गया। वह अपने तेजसे उसी प्रकार | पीड़ाओंको दूर करनेवाला तथा सभी प्रकारके विघ्नोंका
सर्वत्र प्रकाश कर रहा था, जैसे कि भगवान् सूर्य अपने | विनाशक है। मैंने दूर्वाके माहात्म्य तथा गणेशजीके
तेजसे समस्त लोकको प्रकाशित करते हैं ॥ ६९ ॥ | नामका प्रभाव भी तुम्हें बतलाया, अब आगे और क्या
नामके सुननेमात्रसे ही सभी प्रकारके पापोंके | सुनना चाहते हो ? ॥ ७२-७३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'दूर्वा-नाममहिमावर्णन' नामक छिहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७६ ॥
सतहत्तरवाँ अध्याय
श्रीपरशुरामजीके आविर्भावके प्रसंगमें महर्षि जमदग्निका आख्यान, कार्तवीर्यार्जुनका महर्षि
जमदग्निके आश्रममें आना और महर्षिद्वारा कामधेनुके प्रभावसे ससैन्य राजाका सत्कार करना
व्यासजी बोले-[हे ब्रह्मन् !] अन्य किसके | भयभीत रहते थे ॥ ३-४ ॥
द्वारा इस व्रतको किया गया था, उसे बताइये, इस | उनकी पत्नी रेणुका नामसे विख्यात थीं। जिनके
विषयमें मुझे महान् कौतूहल हो रहा है ॥ १ १/२ ॥ | गुंजा (घुँघुची)-के बराबर लावण्यकी भी तुलना कामदेवकी
ब्रह्माजी बोले-प्राचीनकालकी बात है, महर्षि | पत्नी रतिके लावण्यसे नहीं हो सकती ॥ ५ ॥
जमदग्निके पुत्र परशुरामने इस व्रतको किया था, उन्हें | इसी कारणसे वे रेणुका लोकोंमें 'रति' इस नामसे
भी इस व्रतके करनेसे यश, विजय, ज्ञान तथा दीर्घ | विख्यात थीं। जो अपनी सुन्दरतासे सबको मोहित कर
आयुकी प्राप्ति हुई थी ॥ १ १/२ ॥ | देनेवाली थीं; ऐसी उन रेणुकाका वर्णन करनेमें कौन
व्यासजी बोले-हे पितामह ! उन परशुरामजीका | समर्थ है ? ॥ ६ ॥
आविर्भाव कैसे हुआ था और वे किसके द्वारा किससे | जिनके नेत्रोंकी शोभाको प्राप्त करनेके लिये चकोर
उत्पन्न हुए थे ? मेरे पूछनेपर आप यह सब विस्तारपूर्वक | पक्षी जलमें निवास करते हुए और हरिण स्वच्छन्दतापूर्वक
मुझे बतलाइये ॥ २ १/२ ॥ | तृणोंका भक्षणकर वनमें रहते हुए तपस्या करते हैं ॥ ७ ॥
ब्रह्माजी बोले-अत्यन्त विख्यात श्वेतद्वीपमें | जिनके मुखमण्डलकी शोभाको प्राप्त करनेके लिये
महामुनि जमदग्निजी निवास करते थे। वे त्रिकालज्ञ मुनि | चन्द्रमा भी भगवान् शिवकी सेवा करते हैं। वे देवी आदि
अपनी मानसिक शक्तिसे सृष्टि, संहार, निग्रह तथा | और अन्तसे रहित तथा मूलप्रकृतिरूपा ईश्वरी हैं ॥ ८ ॥
अनुग्रह करनेमें समर्थ थे। इसी कारण देवता भी उनसे | उन्हीं रेणुकादेवीसे साक्षात् शिवस्वरूप महाभाग