श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 224, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें२२२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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[बायाँ स्तम्भ]
लिये शेषनागने [भी पूर्वकालमें] वहाँ अनुष्ठान किया
था॥ २१-२३॥
उस अनुष्ठानके फलस्वरूप उन्होंने गणेशजीसे पृथ्वीको
धारण करनेकी सामर्थ्य, सर्वज्ञता, सहस्र सिर और नौ
नागकुलोंमें श्रेष्ठता आदि बहुत-से वरदान प्राप्त किये।
चूँकि प्राचीन कालमें अत्यन्त प्रसन्न मनसे उन्होंने इसे
स्थापित किया था, इसलिये 'धरणीधर' — यह इसका दूसरा
नाम प्रसिद्ध हो गया, जो सुनने और स्मरण करनेसे भी
समस्त कामनाओंको फलीभूत करनेवाला है॥ २४-२६॥
सहस्रबाहु सम्पूर्ण श्रेष्ठ द्विजोंका पूजनकर और
राजाओंसे पूछकर माता-पिताको देखने अपने नगरको
गया। उसे इस प्रकारका (सर्वांगपूर्ण, सुन्दर और
सहस्रभुज) देखकर माता-पिता तथा नगरनिवासी अत्यन्त
हर्षित हुए और उन्होंने सभी श्रेष्ठ द्विजोंको अनेक
प्रकारके दान दिये ॥ २७-२८॥
इन्द्र बोले— [हे राजन्!] मैंने तुमसे संकष्टचतुर्थी
[व्रत]-की अद्भुत महिमाका वर्णन किया, यह शुभ व्रत
मृत्युलोकमें राजा कृतवीर्यद्वारा प्रचलित हुआ ॥ २९ ॥
देवगणों और चन्द्रसेन आदि राजाओंने भी इस
[दायाँ स्तम्भ]
व्रतकी महिमाका अनुभव किया। यह व्रत अत्यन्त पुण्य
प्रदान करनेवाला और स्मरणमात्रसे भी सिद्धि देनेवाला
है। इसी व्रतके प्रभावसे रावणने सर्वज्ञता प्राप्त कर ली
थी। पाण्डवोंने [पूर्वकालमें] इसी व्रतके प्रभावसे पुनः
राज्य प्राप्त किया था ॥ ३०-३१॥
[हे शूरसेन!] इस व्रतके अनुष्ठानका जो पुण्य है,
वह यदि मेरे हाथमें दिया जाय, तभी यह विमान
अमरावतीके लिये प्रस्थान कर सकेगा ॥ ३२ ॥
ब्रह्माजी बोले— [हे व्यास !] शतयज्ञकर्ता इन्द्रके
मुखसे इस संकष्टचतुर्थीव्रतकी महिमा सुनकर राजा शूरसेन
स्वात्मानन्दरूपी महासागरमें अवगाहन करने लगे, तदनन्तर
प्रसन्न मनवाले उन नृपश्रेष्ठ शूरसेनने [देवराज] इन्द्रके
चरणकमलोंकी वन्दनाकर कहा— ॥ ३३-३४१/२ ॥
वे [राजा शूरसेन] बोले—मेरे किसी पूर्वजन्मका
पुण्य उदय हुआ है, जिसके फलस्वरूप मैंने इस प्रकारके
[पुण्यप्रदायक] व्रतके विषयमें सुना। तीनों लोकोंमें इससे
अधिक पुण्य देनेवाला कोई कर्म नहीं है ॥ ३५१/२ ॥
[ब्रह्माजी बोले]—इन्द्रसे ऐसा कहकर वे राजा
शूरसेन तबसे स्वयं व्रत करने लगे ॥ ३६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'चतुर्थीव्रतमाहात्म्य' नामक तिहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७३ ॥
चौहत्तरवाँ अध्याय
संकष्टचतुर्थीव्रतकी महिमाके सन्दर्भमें एक गलत्कुष्ठा चाण्डालीकी कथा
[बायाँ स्तम्भ]
व्यासजी बोले—हे ब्रह्मन् ! उन राजा शूरसेनने
आदरपूर्वक इन्द्रके मुखसे इतिहाससहित संकष्टचतुर्थी
व्रतको सुनकर उस उत्तम व्रतको कैसे किया था ? ॥ १ ॥
ब्रह्माजी बोले— [हे व्यास !] तब उस राजा
शूरसेनने अपने दूतोंको यह कहा कि नगरमें जाओ और
किसी संकष्टचतुर्थी व्रत करनेवालेको ले आओ ॥ २ ॥
[राजाके ऐसा कहनेपर] वे दूत शीघ्रतापूर्वक
नगरमें गये और घर-घर जाकर पूछने लगे। [इस
प्रकार] इधर-उधर भ्रमण करते हुए उन्होंने एक सुन्दर
मंगलमय विमानको देखा, जिसमें एक दुष्ट चाण्डाली
बैठने जा रही थी। उसके अंग कुष्ठसे गल गये थे।
[दायाँ स्तम्भ]
उसके मुखसे [कफ और लारका] स्राव हो रहा था।
उसका शरीर दुर्गन्धयुक्त और मक्खियों एवं कीड़ोंसे भरा
था। उसका उदर शुष्क, बाल बड़े और दाँत, आँख एवं
नासिका [भी] शुष्क थे। वह अत्यन्त मलिन और बड़े-
बड़े कर्णछिद्रोंवाली थी। उसका स्वर ऐसा था, मानो
बादल गरज रहे हों ॥ ३-५ ॥
ऐसे स्वरूपवाली उस भक्त चाण्डालिनीको ले
जानेके लिये आये हुए गणेशदूतोंको देखकर राजदूत
उन्हें प्रणामकर कहने लगे कि 'यह तो बड़ा ही
आश्चर्यजनक है' ॥ ६ ॥
राजाके दूतोंने देवदेव गणेशजीके सेवकोंसे कहा—