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सर्वकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 656 में से

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पृष्ठ 148

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१४६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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५००. ढौकः—सर्वगत; अथवा सर्वज्ञ; ५०१.
दुण्ढिविनायकः—विशिष्ट नायकके रूपमें अन्वेषणीय;
५०२. तत्त्वानां परमं तत्त्वम्—तत्त्वोंमें परम (छब्बीसवें)
तत्त्वरूप; ५०३. तत्त्वंपदनिरूपितः—'तत्-पदार्थ' और
'त्वम्-पदार्थ' की एकताद्वारा निरूपित ॥ ९३ ॥
५०४. तारकान्तरसंस्थानः—आँखकी पुतलीमें
चिन्तन करनेयोग्य; ५०५. तारकः—प्रणवकी भाँति
भवसागरसे पार करनेवाले; ५०६. तारकान्तकः—
तारकासुरका संहार करनेवाले; ५०७. स्थाणुः—सुस्थिर;
सर्वथा अकम्पित; ५०८. स्थाणुप्रियः—शिवके प्रिय
पुत्र; ५०९. स्थाता—युद्धमें दृढ़तापूर्वक डटे रहनेवाले;
५१०. स्थावरं जङ्गमं जगत्—चराचर जगत्स्वरूप ॥ ९४ ॥
५११. दक्षयज्ञप्रमथनः—दक्ष प्रजापतिके यज्ञका
विध्वंस करनेवाले शिवरूप; ५१२. दाता—दानी अथवा
शोधक*—पतितपावन; ५१३. दानवमोहनः—दानवोंको
मोहित (तत्त्वविमुख) करनेवाले; ५१४. दयावान्—
दयालु; ५१५. दिव्यविभवः—लक्ष्मीकी प्राप्ति करानेवाले;
अथवा दिव्य वैभवसे सम्पन्न; ५१६. दण्डभृत्—
दण्डनीतिके पालक; ५१७. दण्डनायकः—दण्डके
प्रवर्तक ॥ ९५ ॥
५१८. दन्तप्रभिन्नाभ्रमालः—सिर हिलानेमात्रसे
दन्ताघातके द्वारा बादलोंकी पंक्तिको छिन्न-भिन्न कर
देनेवाले; ५१९. दैत्यवारणदारणः—दैत्योंको रोकने
और विदीर्ण करनेवाले; ५२०. दंष्ट्रालग्नद्विपघटः—
जिनके दाढ़के एक देशमें भी शत्रुओंके हाथियोंका
समुदाय संलग्न है, ऐसे; ५२१. देवार्थनृगजाकृतिः—
देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये मनुष्य और
हाथीकी आकृति स्वीकार करनेवाले ॥ ९६ ॥
५२२. धनधान्यपतिः—धन और धान्यके स्वामी
तथा दाता; ५२३. धन्यः—धनसे सम्पन्न एवं पुण्यवान्;
५२४. धनदः—धनके दाता; अथवा कुबेरस्वरूप; ५२५.
धरणीधरः—शेषनाग तथा आदिवराहके रूपमें पृथ्वीको
धारण करनेवाले; ५२६. ध्यानैकप्रकटः—एकमात्र ध्यानमें
ही प्रकट होनेवाले; ५२७. ध्येयः—ध्यानमें द्रष्टव्य;
५२८. ध्यानम्—ध्यानस्वरूप; ५२९. ध्यानपरायणः—
ध्यानमें संलग्न रहनेवाले ॥ ९७ ॥
५३०. नन्द्यः—आनन्दनीय; ५३१. नन्दिप्रियः—
नन्दिकेश्वरके प्रिय; ५३२. नादः—नादानुसन्धानसे प्राप्त
होनेवाले नादस्वरूप; ५३३. नादमध्यप्रतिष्ठितः—
नादमें प्रतिष्ठित; ५३४. निष्कलः—अवयवरहित; ५३५.
निर्मलः—दोषरहित; ५३६. नित्यः—नाशरहित; ५३७.
नित्यानित्यः—आकाश और पृथ्वी आदि नित्य एवं
अनित्य रूप धारण करनेवाले; ५३८. निरामयः—
अविद्यारूपी महारोगसे शून्य ॥ ९८ ॥
५३९. परं व्योम—अव्याकृत आकाश या नित्य
धामस्वरूप; ५४०. परं धाम—ज्योतिके ज्योतिःस्वरूप;
५४१. परमात्मा—सम्पूर्ण जीवोंसे उत्कृष्ट आत्मा—
पुरुषोत्तम; ५४२. परं पदम्—परमपदरूप; ५४३.
परात्परः—परसे भी पर—ब्रह्मा, विष्णु और महेशसे भी
उत्तम; ५४४. पशुपतिः—ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त
समस्त जीवोंके पालक; ५४५. पशुपाशविमोचकः—
पशुओं (जीवों)-को विविध पाशों (बन्धनों)-से छुटकारा
दिलानेवाले ॥ ९९ ॥
५४६. पूर्णानन्दः—क्रिया, कर्ता और कर्मके
भेदसे रहित परिपूर्ण सुखस्वरूप; ५४७. परानन्दः—
भूलोकसे लेकर शतगुणोत्तर बढ़े हुए ब्रह्मलोकपर्यन्तके
सम्पूर्ण आनन्दोंको नीचा करके सबसे उत्कृष्ट परमानन्द—
महासुखस्वरूप; ५४८. पुराणपुरुषोत्तमः—क्षर-अक्षरसे
भी उत्तम एवं अनादि होनेके कारण पुराणपुरुषोत्तम;
५४९. पद्मप्रसन्ननयनः—प्रफुल्ल कमलके समान
उल्लासयुक्त नेत्रवाले; ५५०. प्रणताज्ञानमोचनः—
शरणागत सेवकोंको तत्त्वज्ञान देकर उनके अज्ञानका
निवारण करनेवाले ॥ १०० ॥
५५१. प्रमाणप्रत्ययातीतः—प्रमाणजनित प्रतीतियोंसे
ऊपर उठे हुए नित्यज्ञानैकस्वरूप; ५५२. प्रणतार्ति-
निवारणः—प्रणतजनोंकी पीड़ाको दूर कर देनेवाले;
५५३. फलहस्तः—भक्तजनोंको अविलम्ब फल देनेके
कारण मानो समस्त फलोंको हाथमें ही लिये रहनेवाले;

  • शोधनार्थक 'दै' धातुसे 'दाता' बनता है।