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सर्वकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 142

यहाँ पृष्ठ का पूर्ण और सटीक देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:

१४० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
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[बायाँ स्तम्भ]

रूपमें सर्पको धारण करनेवाले; २३४. सर्पग्रैवेय-
**काङ्गदः—**सर्पके ही कण्ठहार और बाजूबंद पहननेवाले;
**२३५. सर्पकक्ष्योदराबन्धः—**करधनीके रूपमें सर्पको
ही धारण करनेवाले; **२३६. सर्पराजोत्तरीयकः—**नागराज
वासुकिको उत्तरीयके रूपमें धारण करनेवाले ॥ ४२ ॥
**२३७. रक्तः—**रक्तवर्ण; २३८. रक्ताम्बरधरः—
लाल वस्त्र धारण करनेवाले; २३९. रक्तमाल्य-
**विभूषणः—**लाल रंगके ही हार और आभूषण धारण
करनेवाले; **२४०. रक्तेक्षणः—**लाल नेत्रोंवाले; २४१.
**रक्तकरः—**लाल हाथोंवाले; २४२. रक्तताल्वोष्ठ-
**पल्लवः—**रक्तवर्णके तालु और ओष्ठपल्लव धारण
करनेवाले ॥ ४३ ॥
२४३. श्वेतः—(विद्याकी कामना रखनेवाले
साधकोंको भगवान् गणेशके श्वेत रूपका ध्यान करना
चाहिये, इस दृष्टिसे श्वेत आदि पाँच नाम दिये जाते
हैं—) श्वेतवर्ण; **२४४. श्वेताम्बरधरः—**श्वेत वस्त्रधारी;
**२४५. श्वेतमाल्यविभूषणः—**श्वेत माला और आभूषण
धारण करनेवाले; **२४६. श्वेतातपत्ररुचिरः—**श्वेतच्छत्र
धारण करनेके कारण अत्यन्त सुन्दर दिखायी देनेवाले;
**२४७. श्वेतचामरवीजितः—**श्वेत चँवर डुलाकर जिनकी
सेवा की जाती है, वे ॥ ४४ ॥
२४८. सर्वावयवसम्पूर्णसर्वलक्षणलक्षितः—
सम्पूर्ण अंगोंमें सामुद्रिक शास्त्रोक्त समस्त शुभ लक्षणोंसे
परिपूर्ण दिखायी देनेवाले; २४९. सर्वाभरणशोभाढ्यः—
सम्पूर्ण आभूषणोंकी शोभासे सम्पन्न; २५०. सर्वशोभा-
**समन्वितः—**लावण्य नामक सम्पूर्ण अंगकान्तिसे
शोभायमान ॥ ४५ ॥
**२५१. सर्वमङ्गलमङ्गल्यः—**समस्त मंगलोंके लिये
भी मंगलकारी; **२५२. सर्वकारणकारणम्—**सम्पूर्ण कारणोंके
भी कारण; **२५३. सर्वदैककरः—**जिनका एकमात्र कर
(शुण्ड-दण्ड) सब कुछ देनेवाला है, वे; २५४. शार्ङ्गी—
शृंगनिर्मित धनुष धारण करनेवाले; (यहाँ 'शार्ङ्गी' आदि
नामोंसे उनके दस आयुधोंको लक्षित कराया जाता है);
**२५५. बीजापूरी—**बिजौरा नीबू या अनार धारण करनेवाले;
**२५६. गदाधरः—**गदाधारी ॥ ४६ ॥


[दायाँ स्तम्भ]

**२५७. इक्षुचापधरः—**गन्नेका धनुष धारण करनेवाले;
**२५८. शूली—**शूलधारी; **२५९. चक्रपाणिः—**हाथमें चक्र
धारण करनेवाले; **२६०. सरोजभृत्—**कमलधारी; २६१.
**पाशी—**पाशधारी; **२६२. धृतोत्पलः—**उत्पल धारण
करनेवाले; **२६३. शालीमञ्जरीभृत्—**धानकी बाल धारण
करनेवाले; **२६४. स्वदन्तभृत्—**एक हाथमें अपने दाँतको
लिये रहनेवाले ॥ ४७ ॥
**२६५. कल्पवल्लीधरः—**हाथमें कल्पलता ग्रहण
करनेवाले; **२६६. विश्वाभयदैककरः—**जिनका मुख्य
कर सम्पूर्ण विश्वसे अभयदान करनेवाला है; अथवा एक
हाथमें 'अभय' नामक मुद्रा धारण करनेवाले; २६७.
**वशी—**सम्पूर्ण विश्वको वशमें रखनेवाले; २६८.
**अक्षमालाधरः—**अक्षमालाधारी; २६९. ज्ञानमुद्रावान्—
ज्ञानकी मुद्रासे युक्त; **२७०. मुद्गरायुधः—**मुद्गर नामक
शस्त्र धारण करनेवाले ॥ ४८ ॥
**२७१. पूर्णपात्री—**पूर्णपात्रयुक्त यज्ञस्वरूप; अथवा
अमृतसे भरे पात्रवाले; **२७२. कम्बुधरः—**शंखधारी;
**२७३. विधुतालिसमुद्गकः—**मदजलसे आर्द्र गण्ड-
स्थलपर मँडराते हुए भ्रमरसमूहसे युक्त; २७४.
**मातुलिङ्गधरः—**बिजौरा नीबू लिये रहनेवाले;
**२७५. चूतकलिकामृत्—**आम्रमंजरी धारण करनेवाले;
**२७६. कुठारवान्—**कुठारधारी ॥ ४९ ॥
२७७. पुष्करस्थस्वर्णघटीपूर्णरत्नाभिवर्षकः—
शून्यमें गृहीत सुवर्णमय कलशसे पूर्ण रत्नोंकी वर्षा
करनेवाले; **२७८. भारतीसुन्दरीनाथः—**सरस्वती, गौरी
तथा लक्ष्मीके स्वामी ब्रह्मा, शिव और विष्णुरूप; २७९.
**विनायकरतिप्रियः—**विनायक नामवाले अपने गणोंके
साथ खेलनेमें रुचि रखनेवाले ॥ ५० ॥
**२८०. महालक्ष्मीप्रियतमः—**महालक्ष्मीके प्रियतम
(ये महालक्ष्मी विष्णुपत्नी लक्ष्मीसे भिन्न हैं; ये गणेशकी
अपनी प्रिया बुद्धिरूपा हैं। सिद्धलक्ष्मी इनकी दूसरी पत्नी
हैं); **२८१. सिद्धलक्ष्मीमनोरमः—**सिद्धलक्ष्मीके
हृदयवल्लभ; **२८२. रमारमेशपूर्वाङ्गः—**आवरण-
देवताओंमें रमा और रमापति (लक्ष्मी तथा विष्णु)
गणेशजीके पूर्वभागमें (सम्मुख) विराजमान होते हैं,


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