गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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श्रेष्ठ पुरुषोंके वाक्यमें अविश्वास, अपवित्रता, कर्मोंका न
करना, वेद और देवताओंकी निन्दा करना ॥ ७ ॥
मुनिश्रोत्रियविप्राणां तथा स्मृतिपुराणयोः ॥
पाखण्डवाक्येविश्वासःसंगतिर्मलिनात्मनाम् ८
मुनि, श्रोत्रिय, ब्राह्मण, तथा स्मृति, पुराणकी निन्दा,
पाखण्ड वाक्यमें विश्वास, दुष्टों तथा मलीन पुरुषोंकी संगति
करनी ॥ ८ ॥
सदम्भकर्मकर्तृत्वं स्पृहा च परवस्तुषु ॥
अनेककामनावत्त्वं सर्वदाऽनृतभाषणम् ॥ ९ ॥
पांखड सहित कर्म करना, दूसरेकी वस्तुओंमें इच्छा,
अनेक कामना होनी, सदा झूठ बोलना ॥ ९ ॥
परोत्कर्षासहिष्णुत्वं परकृत्यपराहतिः ॥
इत्याद्या बहवश्चान्ये राक्षस्याः प्रकृतेर्गुणाः॥१०॥
दूसरेकी उत्कर्षता न सहनी, दूसरेके कृत्यको नष्ट करना,
इत्यादिक बहुत सारे राक्षसी प्रकृतिके गुण हैं ॥ १० ॥
पृथिव्यां स्वर्गलोके च परिवृत्य वसन्ति ते ॥
मद्भक्तिरहिता लोका राक्षसीं प्रकृतिं श्रिताः ११